
अमेरिका-ईरान शांति समझौते से तेल सस्ता, वैश्विक बाजारों में राहत
होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर खुलने की उम्मीद से कच्चे तेल की कीमतें गिरीं, डॉलर कमजोर पड़ा और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को सहारा मिला।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के अंत की ओर पहला ठोस कदम बढ़ाते हुए दोनों देशों ने एक प्रारंभिक शांति रूपरेखा पर सहमति जताई है, जिसके तहत रणनीतिक होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का रास्ता साफ हो गया है। इस खबर से सोमवार को वैश्विक वित्तीय बाजारों में जोखिम लेने की भूख लौट आई और कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड का भाव 5 प्रतिशत से अधिक लुढ़ककर 82 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया, जबकि अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड पर प्रतिफल भी नरम पड़ा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संकेत दिया है कि औपचारिक समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने की संभावना है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधा बन चुके भू-राजनीतिक जोखिम में कमी की उम्मीद जगी है।
विकसित बाजारों में इस घटनाक्रम का असर सबसे स्पष्ट दिखा। अमेरिकी डॉलर सूचकांक दस दिन के निचले स्तर पर आ गया और यूरो तथा पाउंड स्टर्लिंग के मुकाबले कमजोर हुआ। वहीं, अमेरिकी शेयर बाजारों में टेक्नोलॉजी शेयरों की ओर निवेशकों का रुझान बढ़ा, जिससे एसएंडपी 500 और नैस्डैक को बल मिला। तेल की कीमतों में गिरावट से परिवहन और विनिर्माण क्षेत्रों की लागत घटने की उम्मीद ने भी बाजार की धारणा को मजबूत किया। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि यह रुझान तब तक कायम रहेगा जब तक समझौते की औपचारिक घोषणा नहीं हो जाती और ईरान द्वारा परमाणु मुद्दे पर अतिरिक्त रियायतों की अटकलें बनी रहती हैं।
उभरते बाजारों में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। ब्राजील में डॉलर के मुकाबले रियाल शुरुआती मजबूती के बाद स्थिरता की ओर लौटा, जबकि आईबोवेस्पा सूचकांक दोपहर बाद नकारात्मक दायरे में चला गया। इसकी एक वजह अमेरिकी टेक शेयरों की ओर पूंजी का रोटेशन रहा, जिसने स्थानीय बाजार से विदेशी निवेश खींच लिया। दूसरी ओर, ब्राजील के ब्याज दर वायदा में गिरावट जारी रही, जो वैश्विक जोखिम प्रीमियम में कमी का संकेत है। मेक्सिको में पेसो 0.16 प्रतिशत मजबूत होकर 17.20 प्रति डॉलर पर पहुंच गया, जो निवेशकों के बढ़े हुए आत्मविश्वास को दर्शाता है।
दक्षिण एशिया, खासकर भारत के लिए यह घटनाक्रम कई मायनों में राहत लेकर आया है। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक के रूप में भारत की आयात लागत में कमी से चालू खाता घाटा और मुद्रास्फीति के दबाव में नरमी आ सकती है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली भारत की अधिकांश तेल आपूर्ति अब बिना किसी व्यवधान के जारी रहने की संभावना है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा को बल मिलेगा। हालांकि, विशेषज्ञ सावधान करते हैं कि समझौते की बारीकियां अभी सार्वजनिक नहीं हुई हैं और लेबनान जैसे अन्य क्षेत्रीय तनाव बिंदुओं पर स्थायी विराम को लेकर संदेह बना हुआ है। आने वाले दिनों में औपचारिक हस्ताक्षर और उसके बाद के क्रियान्वयन पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।
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