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सोमवार, 15 जून 2026

नेतन्याहू ने ट्रंप से मतभेद स्वीकारा, ईरान डील को अपनी 'परमाणु विजय' बताया

अमेरिका-ईरान समझौते के बाद पहली प्रतिक्रिया में इज़राइली प्रधानमंत्री ने परमाणु ख़तरा टालने का दावा किया, लेकिन लेबनान में सैन्य मौजूदगी जारी रखने की ज़िद और चुनावी मैदान में उतरने की घोषणा ने नई अनिश्चितता पैदा कर दी।

अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम और परमाणु मुद्दे पर सहमति की ख़बरों के बीच इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सोमवार को टेलीविज़न पर प्रसारित संवाददाता सम्मेलन में पहली बार सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका के साथ संयुक्त सैन्य अभियान ने इज़राइल को ईरानी 'परमाणु विनाश' के ख़तरे से बचा लिया है। नेतन्याहू ने कहा कि परमाणु वैज्ञानिकों को निष्क्रिय कर दिया गया, मिसाइल फ़ैक्ट्रियाँ ध्वस्त कर दी गईं और ईरान का बेड़ा तथा वायुसेना तबाह कर दी गई। साथ ही उन्होंने स्वीकार किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हर मुद्दे पर आँखें नहीं मिलतीं—'यह अच्छे परिवारों में भी होता है'—लेकिन इज़राइल की सुरक्षा का फ़ैसला वही करेंगे।

यह समझौता, जिस पर शुक्रवार को जिनेवा में हस्ताक्षर होने की उम्मीद है, पाकिस्तान की मध्यस्थता में सामने आया और इसमें स्थायी युद्धविराम, होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खुला रखने तथा ईरान द्वारा परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता शामिल है। हालाँकि सीआईए प्रमुख जॉन रैटक्लिफ़ ने ट्रंप को आगाह किया है कि ख़ुफ़िया सूचनाएँ ईरानी इरादों पर संदेह पैदा करती हैं। लेबनान से हज़ारों विस्थापित परिवारों ने घर लौटना शुरू कर दिया है, लेकिन इज़राइल ने साफ़ कर दिया कि उसकी सेनाएँ दक्षिणी लेबनान, ग़ज़ा और सीरिया में बनी रहेंगी और हिज़बुल्लाह के ख़िलाफ़ कार्रवाई जारी रखी जाएगी। रक्षा मंत्री इज़राइल कात्ज़ ने 'पूरी ताक़त' से जवाब देने की चेतावनी दी, जिससे ज़मीनी तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा।

इज़राइल के भीतर यह डील भारी राजनीतिक आक्रोश का कारण बन गई है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने इसे 'आपदा' और अमेरिकी 'विश्वासघात' करार दिया। हारेत्ज़ के सैन्य विश्लेषक आमोस हारेल ने लिखा कि सात अक्तूबर के हमलों के बाद यह नेतन्याहू की दूसरी सबसे बड़ी रणनीतिक विफलता है, क्योंकि हमास का सफ़ाया नहीं हुआ और ईरान समझौते से कहीं अधिक मज़बूत स्थिति में उभर रहा है। आलोचना के इस शोर के बीच नेतन्याहू ने अक्तूबर में होने वाले चुनावों में फिर से उतरने और जीतने का इरादा ज़ाहिर किया, जबकि भ्रष्टाचार के मुक़दमे और गिरती लोकप्रियता उनके सामने खड़ी हैं।

दक्षिण एशिया के लिए इस घटनाक्रम के गहरे मायने हैं। पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी कूटनीतिक हैसियत मज़बूत की है, वहीं भारत की ऊर्जा सुरक्षा सीधे होर्मुज़ जलडमरूमध्य की स्थिरता से जुड़ी है, जहाँ से उसका बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आता है। तेल की क़ीमतों में हालिया उछाल के बाद यह समझौता राहत ला सकता है, लेकिन इज़राइल की एकतरफ़ा सैन्य कार्रवाइयाँ क्षेत्रीय अस्थिरता बनाए रखेंगी तो भारत को अपने इज़राइल-विरोधी ईरान संबंधों और पश्चिम एशिया में बढ़ती चीनी मौजूदगी के बीच कठिन संतुलन साधना होगा।

विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू के सामने अब दोहरा संकट है: एक ओर ट्रंप से बढ़ती दरार उन्हें अमेरिकी समर्थन से वंचित कर सकती है, दूसरी ओर घरेलू मोर्चे पर 'पूर्ण विजय' के वादे की विफलता चुनावी संभावनाओं को धूमिल कर रही है। अगर ट्रंप प्रशासन लेबनान में इज़राइली हमलों को लेकर सार्वजनिक रूप से सख़्त हुआ तो नेतन्याहू के लिए अपनी सैन्य महत्त्वाकांक्षाओं और कूटनीतिक अलगाव के बीच रास्ता निकालना और भी मुश्किल हो जाएगा।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 2 भाषाएँ

44%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa europea continentaleStampa latinoamericana
Stampa europea continentale
distaccopragmatismo

नेतन्याहू ने फिर से चुनाव लड़ने की घोषणा की और जीत का इरादा जताया। उनका कहना है कि ईरान से टकराव खत्म नहीं हुआ है और तेहरान परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा, चाहे समझौता हो या न हो। लेबनान पर ट्रंप से मतभेद भी उजागर हुआ।

Stampa latinoamericana
trionfourgenza

नेतन्याहू ने ईरान समझौते को एक जीत के रूप में मनाया जिसने इज़राइल को परमाणु विनाश के खतरे से बचा लिया। घरेलू आलोचना को दरकिनार करते हुए उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए चुनाव लड़ने की पुष्टि की। जोर इस बात पर है कि अस्तित्व का संकट टल गया।

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नेतन्याहू ने ट्रंप से मतभेद स्वीकारा, ईरान डील को अपनी 'परमाणु विजय' बताया

अमेरिका-ईरान समझौते के बाद पहली प्रतिक्रिया में इज़राइली प्रधानमंत्री ने परमाणु ख़तरा टालने का दावा किया, लेकिन लेबनान में सैन्य मौजूदगी जारी रखने की ज़िद और चुनावी मैदान में उतरने की घोषणा ने नई अनिश्चितता पैदा कर दी।

अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम और परमाणु मुद्दे पर सहमति की ख़बरों के बीच इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सोमवार को टेलीविज़न पर प्रसारित संवाददाता सम्मेलन में पहली बार सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका के साथ संयुक्त सैन्य अभियान ने इज़राइल को ईरानी 'परमाणु विनाश' के ख़तरे से बचा लिया है। नेतन्याहू ने कहा कि परमाणु वैज्ञानिकों को निष्क्रिय कर दिया गया, मिसाइल फ़ैक्ट्रियाँ ध्वस्त कर दी गईं और ईरान का बेड़ा तथा वायुसेना तबाह कर दी गई। साथ ही उन्होंने स्वीकार किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हर मुद्दे पर आँखें नहीं मिलतीं—'यह अच्छे परिवारों में भी होता है'—लेकिन इज़राइल की सुरक्षा का फ़ैसला वही करेंगे।

यह समझौता, जिस पर शुक्रवार को जिनेवा में हस्ताक्षर होने की उम्मीद है, पाकिस्तान की मध्यस्थता में सामने आया और इसमें स्थायी युद्धविराम, होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खुला रखने तथा ईरान द्वारा परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता शामिल है। हालाँकि सीआईए प्रमुख जॉन रैटक्लिफ़ ने ट्रंप को आगाह किया है कि ख़ुफ़िया सूचनाएँ ईरानी इरादों पर संदेह पैदा करती हैं। लेबनान से हज़ारों विस्थापित परिवारों ने घर लौटना शुरू कर दिया है, लेकिन इज़राइल ने साफ़ कर दिया कि उसकी सेनाएँ दक्षिणी लेबनान, ग़ज़ा और सीरिया में बनी रहेंगी और हिज़बुल्लाह के ख़िलाफ़ कार्रवाई जारी रखी जाएगी। रक्षा मंत्री इज़राइल कात्ज़ ने 'पूरी ताक़त' से जवाब देने की चेतावनी दी, जिससे ज़मीनी तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा।

इज़राइल के भीतर यह डील भारी राजनीतिक आक्रोश का कारण बन गई है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने इसे 'आपदा' और अमेरिकी 'विश्वासघात' करार दिया। हारेत्ज़ के सैन्य विश्लेषक आमोस हारेल ने लिखा कि सात अक्तूबर के हमलों के बाद यह नेतन्याहू की दूसरी सबसे बड़ी रणनीतिक विफलता है, क्योंकि हमास का सफ़ाया नहीं हुआ और ईरान समझौते से कहीं अधिक मज़बूत स्थिति में उभर रहा है। आलोचना के इस शोर के बीच नेतन्याहू ने अक्तूबर में होने वाले चुनावों में फिर से उतरने और जीतने का इरादा ज़ाहिर किया, जबकि भ्रष्टाचार के मुक़दमे और गिरती लोकप्रियता उनके सामने खड़ी हैं।

दक्षिण एशिया के लिए इस घटनाक्रम के गहरे मायने हैं। पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी कूटनीतिक हैसियत मज़बूत की है, वहीं भारत की ऊर्जा सुरक्षा सीधे होर्मुज़ जलडमरूमध्य की स्थिरता से जुड़ी है, जहाँ से उसका बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आता है। तेल की क़ीमतों में हालिया उछाल के बाद यह समझौता राहत ला सकता है, लेकिन इज़राइल की एकतरफ़ा सैन्य कार्रवाइयाँ क्षेत्रीय अस्थिरता बनाए रखेंगी तो भारत को अपने इज़राइल-विरोधी ईरान संबंधों और पश्चिम एशिया में बढ़ती चीनी मौजूदगी के बीच कठिन संतुलन साधना होगा।

विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू के सामने अब दोहरा संकट है: एक ओर ट्रंप से बढ़ती दरार उन्हें अमेरिकी समर्थन से वंचित कर सकती है, दूसरी ओर घरेलू मोर्चे पर 'पूर्ण विजय' के वादे की विफलता चुनावी संभावनाओं को धूमिल कर रही है। अगर ट्रंप प्रशासन लेबनान में इज़राइली हमलों को लेकर सार्वजनिक रूप से सख़्त हुआ तो नेतन्याहू के लिए अपनी सैन्य महत्त्वाकांक्षाओं और कूटनीतिक अलगाव के बीच रास्ता निकालना और भी मुश्किल हो जाएगा।

स्रोतों में मतभेद

— · 3 स्रोत · 2 भाषाएँ

44%मध्यम

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

समर्थक72%
न्यूनत्र14%
निंदक14%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 2 भाषाएँ

लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa europea continentaleStampa latinoamericana
Stampa europea continentale
distaccopragmatismo

नेतन्याहू ने फिर से चुनाव लड़ने की घोषणा की और जीत का इरादा जताया। उनका कहना है कि ईरान से टकराव खत्म नहीं हुआ है और तेहरान परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा, चाहे समझौता हो या न हो। लेबनान पर ट्रंप से मतभेद भी उजागर हुआ।

Stampa latinoamericana
trionfourgenza

नेतन्याहू ने ईरान समझौते को एक जीत के रूप में मनाया जिसने इज़राइल को परमाणु विनाश के खतरे से बचा लिया। घरेलू आलोचना को दरकिनार करते हुए उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए चुनाव लड़ने की पुष्टि की। जोर इस बात पर है कि अस्तित्व का संकट टल गया।

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