
संवैधानिक बदलावों की वैश्विक लहर: जिम्बाब्वे, कजाकिस्तान और आर्मेनिया में सत्ता विस्तार और भू-राजनीतिक पुनर्संरेखण
जिम्बाब्वे में राष्ट्रपति का कार्यकाल 2030 तक बढ़ा, कजाकिस्तान में टोकायव को फिर चुनाव लड़ने की अनुमति, और आर्मेनिया क्षेत्रीय दावे छोड़ने के लिए जनमत संग्रह की तैयारी में।
जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति एमर्सन म्नांगाग्वा ने मंगलवार को एक संवैधानिक संशोधन विधेयक पर हस्ताक्षर कर उसे कानून बना दिया, जिसके तहत राष्ट्रपति और सांसदों का कार्यकाल पाँच से बढ़ाकर सात वर्ष कर दिया गया है तथा प्रत्यक्ष राष्ट्रपति चुनावों को समाप्त कर संसद को राष्ट्रपति नियुक्त करने का अधिकार दे दिया गया है। इसी सप्ताह कजाकिस्तान के संवैधानिक न्यायालय ने निर्णय दिया कि मार्च 2026 में जनमत संग्रह से पारित नए संविधान के लागू होने से राष्ट्रपति कासिम-जोमार्त तोकायव के कार्यकालों की गिनती शून्य हो गई है, जिससे वे 2029 में अपना वर्तमान कार्यकाल समाप्त होने पर पुनः चुनाव लड़ सकते हैं और संभावित रूप से 2036 तक सत्ता में बने रह सकते हैं।
जिम्बाब्वे के विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने इन बदलावों को “संवैधानिक तख्तापलट” करार दिया है। विपक्षी नेता टेंडाई बिटी के अनुसार, यह कानून सत्ता का पूर्ण निजीकरण करता है और चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर देता है। कजाकिस्तान में आधिकारिक बयानों में कहा गया है कि संविधान संशोधन का उद्देश्य तेजी से बदलती दुनिया में त्वरित निर्णय लेने की क्षमता सुनिश्चित करना है, हालांकि पश्चिमी विश्लेषक इसे कार्यकारी शक्तियों के सुदृढ़ीकरण के रूप में देखते हैं। आर्मेनिया में प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान की सिविल कॉन्ट्रैक्ट पार्टी ने जून के संसदीय चुनावों में जीत के बाद एक संवैधानिक जनमत संग्रह की योजना बनाई है, जो 2027 में हो सकता है और जिसका उद्देश्य कराबाख के साथ पुनर्मिलन के संवैधानिक दावे को हटाकर अज़रबैजान के साथ अगस्त 2025 में हस्ताक्षरित शांति ढाँचे को स्थायी बनाना है।
इन संवैधानिक प्रक्रियाओं के भू-राजनीतिक आयाम भी स्पष्ट हैं। पश्चिमी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, रूस ने आर्मेनिया के चुनावों में सूचना युद्ध और रूसी-आर्मीनियाई कुलीन वर्गों के नेटवर्क के माध्यम से हस्तक्षेप का प्रयास किया, ताकि पशिनयान को हटाकर येरेवन के पश्चिमोन्मुखी रुख को उलटा जा सके। आर्मेनिया का प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन क्षेत्रीय दावों को त्याग कर न केवल अज़रबैजान के साथ शांति को संस्थागत करेगा, बल्कि मध्य कॉरिडोर और ट्रम्प रूट फॉर इंटरनेशनल पीस जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाओं में उसकी भागीदारी को भी मजबूत करेगा। कजाकिस्तान का संवैधानिक पुनर्गठन ऐसे समय में हुआ है जब देश रूस और पश्चिम के बीच यूक्रेन युद्ध के कारण उत्पन्न तनावों के बीच संतुलन बनाए हुए है, और नया संविधान राष्ट्रपति को प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति तथा विधायी पहल में अधिक स्वायत्तता प्रदान करता है।
जिम्बाब्वे में सत्तारूढ़ ज़ानू-पीएफ़ पार्टी 1980 में स्वतंत्रता के बाद से सत्ता में है, और ये संशोधन उसकी पकड़ को और मजबूत करेंगे। आलोचकों का कहना है कि सरकार आर्थिक संकट और भ्रष्टाचार के आरोपों से ध्यान हटाने में विफल रही है। कजाकिस्तान में तोकायव ने एक वर्ष पूर्व अल जज़ीरा को दिए साक्षात्कार में कहा था कि वे 2029 में दोबारा चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन संवैधानिक न्यायालय के निर्णय ने उनके लिए यह विकल्प खोल दिया है। आर्मेनिया में विपक्षी राष्ट्रवादी ताकतें संवैधानिक जनमत संग्रह का विरोध कर सकती हैं, जिससे इसका पारित होना अनिश्चित है। जिम्बाब्वे का नया कानून तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है, कजाकिस्तान में अगला राष्ट्रपति चुनाव 2029 में अपेक्षित है, और आर्मेनिया में जनमत संग्रह की तिथि अभी प्रस्तावित है।
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.70 | critical |
|---|---|---|
| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | −0.50 | critical |
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | −0.50 | critical |
ज़िम्बाब्वे ने एक संवैधानिक तख्तापलट किया है: राष्ट्रपति मनांगाग्वा ने प्रत्यक्ष चुनावों को समाप्त कर दिया और 2030 तक सत्ता सुरक्षित कर ली।
'संवैधानिक तख्तापलट' का लेबल विपक्ष से अपनाया गया है और इसे एक वस्तुनिष्ठ तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है, बिना सरकार के दृष्टिकोण को संतुलित किए।
राष्ट्रपति मनांगाग्वा ने 2030 तक अपना कार्यकाल बढ़ाने और प्रत्यक्ष चुनावों को समाप्त करने वाले कानून पर हस्ताक्षर किए। विपक्ष इसे संवैधानिक तख्तापलट कहता है।
रिपोर्ट सरकार की आधिकारिक घोषणा को विपक्ष की आलोचना के साथ संतुलित करती है, लेकिन तथ्यात्मक स्वर और सत्तारूढ़ दल के बहुमत का उल्लेख सूक्ष्म रूप से परिवर्तन को सामान्य बनाता है।
संवैधानिक सुधार कानून बन गया है: मनांगाग्वा 2030 तक राष्ट्रपति बने रहेंगे, ज़ानू-पीएफ़ संसद को नियंत्रित करेगा। विपक्ष इसे तख्तापलट कहता है।
कानूनी प्रक्रिया ('हस्ताक्षरित, सीलबंद और वितरित') और सत्तारूढ़ दल के बहुमत पर जोर देकर, कवरेज परिवर्तन को एक नियमित विधायी कार्य के रूप में प्रस्तुत करता है, इसके लोकतांत्रिक निहितार्थों को कम करता है।
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