
ईरान ने अमेरिका को समझौता उल्लंघन पर 'करारा जवाब' देने की चेतावनी दी, 60-दिवसीय वार्ता की राह में बाधाएं
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और संसद अध्यक्ष ने कहा कि यदि अमेरिका ने समझौते का उल्लंघन किया या अत्यधिक मांगें रखीं तो पूर्व-निर्धारित योजना के तहत जवाबी कार्रवाई होगी।
अमेरिका और ईरान के बीच हस्ताक्षरित स्मझौता ज्ञापन (एमओयू) के लागू होने के साथ ही तेहरान ने किसी भी उल्लंघन पर सख्त प्रतिक्रिया की चेतावनी जारी की है, जबकि 60-दिवसीय तकनीकी वार्ता का मार्ग अभी तय नहीं हो पाया है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने एक बयान में कहा कि अमेरिकी पक्ष द्वारा किसी विचलन या उल्लंघन की स्थिति में पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार जवाबी कार्रवाई की जाएगी। संसद अध्यक्ष और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद-बाग़ेर ग़ालीबाफ़ ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यदि वाशिंगटन ने दुर्भावना, समझौते का उल्लंघन या अत्यधिक मांगें प्रस्तुत कीं तो ईरान 'दुश्मन को कुचलने वाला जवाब' देने में कोई हिचक नहीं दिखाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका को युद्ध में एक बार 'थप्पड़' पड़ चुका है और यदि वह फिर उसी राह पर चला तो 'और भी ज़ोरदार थप्पड़' पड़ेगा।
तेहरान के इस रुख़ के पीछे सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह मोजतबा ख़ामेनेई का निर्देश बताया गया है, जिन्होंने समझौते की शर्तों और खंडों को साकार करने का काम सौंपा है। ईरानी पक्ष ने स्पष्ट किया कि वह अमेरिका की किसी भी अतिरिक्त मांग को स्वीकार नहीं करेगा और समझौते को पूरी तरह लागू कराने पर ज़ोर देगा। दूसरी ओर, अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने चेतावनी दी कि यदि ईरान अपने दायित्वों का पालन नहीं करता तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई और नौसैनिक नाकेबंदी फिर से शुरू कर देगा। व्हाइट हाउस के एक प्रवक्ता ने बताया कि तकनीकी वार्ता की योजना अभी तय नहीं हुई है, लेकिन अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पहले अवसर पर रवाना होने को तैयार है।
17 जून को दूरस्थ रूप से हस्ताक्षरित इस्लामाबाद स्मझौता ज्ञापन ने 28 फ़रवरी से जारी सैन्य संघर्ष को विराम देने का रास्ता खोला है। दस्तावेज़ के तहत ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने और अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी हटाने पर सहमति दी है। 60 दिनों के भीतर दोनों पक्षों को ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों की समाप्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर अंतिम समझौता करना है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के अनुसार यह अवधि 18 जून से आरंभ हुई, जिससे अंतिम समझौते की समय-सीमा 17 अगस्त बनती है।
दक्षिण एशिया और भारत के लिए इस घटनाक्रम के ऊर्जा और कनेक्टिविटी से जुड़े प्रत्यक्ष प्रभाव हो सकते हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य के खुलने से वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग बहाल होगा, जिससे कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना है। ईरानी तेल निर्यात की बहाली से भारत जैसे बड़े आयातकों को आपूर्ति विविधता और मूल्य वार्ता में लाभ मिल सकता है। साथ ही, चाबहार बंदरगाह के विकास से जुड़ी भारत की रणनीतिक परियोजना को स्थिरता का लाभ मिलेगा, बशर्ते प्रतिबंधों में ढील दी जाए।
पिछली बड़ी परमाणु डील (जेसीपीओए) से 2018 में अमेरिका के बाहर निकलने और उसके बाद बढ़ते तनाव के इतिहास को देखते हुए दोनों पक्षों के बीच गहरा अविश्वास बना हुआ है। शुक्रवार को स्विट्ज़रलैंड के ब्यूरगेनस्टॉक में होने वाली कार्यान्वयन वार्ता रद्द हो चुकी है, और तकनीकी वार्ता की तिथि अब भी अनिश्चित है। इस बीच, तेहरान और वाशिंगटन दोनों एक-दूसरे को सार्वजनिक चेतावनियाँ दे रहे हैं, जिससे 60-दिवसीय वार्ता प्रक्रिया की नाज़ुकता उजागर होती है। अगला ठोस क़दम तकनीकी वार्ता की तारीख़ तय होना है, जिसके बाद ही अंतिम समझौते की दिशा में प्रगति का आकलन संभव होगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरान ने संयुक्त राज्य अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी है: ज्ञापन के किसी भी उल्लंघन या अत्यधिक मांगों का जवाब पहले से भी अधिक जोरदार 'थप्पड़' से दिया जाएगा। संसद अध्यक्ष ने जोर देकर कहा कि यदि वाशिंगटन ने बुरी नीयत दिखाई तो तेहरान कुचलने वाली प्रतिक्रिया के लिए तैयार है। 60-दिवसीय वार्ता अवधि को अमेरिकी विश्वसनीयता की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है, और ईरान समझौते के पूर्ण कार्यान्वयन पर जोर दे रहा है।
ईरान ने संकेत दिया है कि यदि संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ समझौता भंग होता है या अनुचित मांगें की जाती हैं तो वह दृढ़ता से जवाब देगा। यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब दोनों देश 60-दिवसीय महत्वपूर्ण वार्ता चरण में प्रवेश कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य रूपरेखा समझौते को स्थायी युद्धविराम में बदलना है। यह बयान ईरान के संसद अध्यक्ष ने सोशल मीडिया के माध्यम से दिया।
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