
जापान का पंच: एक खिलौना, एक संघर्ष और दुनिया भर से आई 2500 जन्मदिन बधाइयाँ
इचिकावा चिड़ियाघर में मनाए गए पंच के पहले जन्मदिन पर उसकी कहानी ने सोशल मीडिया से परे असली दुनिया में भी लोगों को जोड़ा।
इचिकावा के जूलॉजिकल और बॉटनिकल गार्डन के एक कोने में, एक बंद कमरे की दीवारों पर रंग-बिरंगे कागज़ों की तहें लहरा रही थीं। ये जन्मदिन कार्ड थे—कुछ हाथ से बने, कुछ पर चमचमाते स्टिकर—जो जापान ही नहीं, अमेरिका, यूरोप और एशिया से आए थे। इन सबके केंद्र में एक छोटी-सी टेबल पर रखा था एक नारंगी रंग का ऊनी खिलौना—एक ऑरंगउटान, जिसकी बाँहों ने कभी एक अनाथ बंदर के बच्चे को सुकून दिया था। पास ही एक स्क्रीन पर चल रही थी वीडियो, जिसमें वही बच्चा, पंच, काँपती टाँगों पर खड़ा होकर उसी खिलौने को कसकर पकड़े हुए था। यह सब पंच के पहले जन्मदिन का नज़ारा था, जो अब इंटरनेट की सनसनी नहीं, बल्कि एक सच्ची भावनात्मक कहानी बन चुका था।
एक साल पहले, जुलाई की तपती दोपहर में, पंच का जन्म इचिकावा चिड़ियाघर में हुआ था। पर उसकी माँ ने थकावट के कारण उसे त्याग दिया। चिड़ियाघर के रखवालों ने उसे हाथों-हाथ उठा लिया और एक खास ज़रूरत पूरी करने के लिए उसे दिया वह ऑरंगउटान खिलौना—मकाक बच्चों को माँ के बालों को पकड़ने की क्षमता सीखनी होती है, और यह खिलौना उसी का विकल्प बना। शुरुआती छह महीने दो विशेष रखवालों ने पंच की देखभाल की, फिर मध्य जनवरी में उसे 50 अन्य बंदरों के समूह में छोड़ा गया। पर वहाँ शुरू में अन्य बंदरों ने उसे भगा दिया। पंच हर बार भागकर अपने खिलौने के पास आ जाता और उसे गले लगाकर सुकून पाता। यही तस्वीरें फरवरी में जब चिड़ियाघर ने सोशल मीडिया पर डालीं, तो देखते-ही-देखते लाखों लोगों ने साझा कर दीं। हैशटैग #HangInTherePunch के साथ दुनिया भर से समर्थन उमड़ पड़ा। चिड़ियाघर में दसियों हज़ार आगंतुक आने लगे—आधे विदेश से—जो पंच की एक झलक पाने को बेताब थे।
यह आकर्षण केवल प्यारी तस्वीरों का नहीं था; लोगों ने एक अकेले जीव के संघर्ष को पहचाना जो धीरे-धीरे स्वीकार्यता हासिल कर रहा था। कोबे की कुमी इशिज़ावा एक गंभीर बीमारी से जूझते हुए पंच की कहानी के ज़रिए खुद को स्वस्थ होने की प्रेरणा देती रहीं। 'वह मेरे लिए एक लक्ष्य बन गया था। मैं ठीक होकर उसे देखने ज़रूर आऊँगी,' उन्होंने कहा। अंततः वे चिड़ियाघर पहुँचीं और अपनी भावुकता छिपा न सकीं। स्थानीय निवासी येये लाइट्स ने तो वार्षिक पास ही बनवा लिया और पंच के लिए केक तक लेकर आईं। मात्र कुछ महीनों में पंच ने एक सच्चा वैश्विक समुदाय बना लिया था—ऐसा नहीं कि वह किसी कूटनीति का हिस्सा था, बल्कि इसलिए कि एक मासूम संघर्ष ने सीमाओं से परे संवेदना को जगाया।
आज पंच अब वह मोटा-सा बच्चा नहीं रहा जो हर वक्त खिलौने से लिपटा रहता था। वह अन्य बंदरों के साथ खेलता है, उछलता-कूदता है, और उसमें और बाकियों में अंतर करना मुश्किल हो गया है। उसका प्रिय खिलौना अब पिंजरे के एकांत कोने में रखा रहता है। इस जन्मदिन पर चिड़ियाघर प्रशासन ने कोई सार्वजनिक आयोजन नहीं किया, ताकि बंदरों का तनाव न बढ़े और भीड़ का दवाब न पड़े। लेकिन दो हज़ार पाँच सौ कार्डों की मूक उपस्थिति बता रही थी कि पंच की कहानी ने दुनिया के कोने-कोने में कितनी उम्मीद बाँटी। आखिर, एक खिलौने और एक अकेले बच्चे की यह यात्रा बताती है कि अपनापन पाना भले कठिन हो, पर असंभव नहीं।
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