
वैश्विक स्तर पर सोशल मीडिया पर नाबालिगों की पहुंच सीमित करने की दौड़, यूरोपीय संघ भी कड़े कदम उठाने की तैयारी में
ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया समेत 20 से अधिक देशों ने नाबालिगों के सोशल मीडिया उपयोग पर रोक लगाई या प्रस्तावित की है, जबकि यूरोपीय संघ नियामक उपायों और मंचों के 'व्यसनकारी डिज़ाइन' के खिलाफ कार्रवाई पर विचार कर रहा है।
दुनिया भर में नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने का सिलसिला तेजी से बढ़ रहा है। ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए दिसंबर 2025 से प्रतिबंध प्रभावी है, जबकि ब्राजील, इंडोनेशिया और मलेशिया ने भी इसी उम्र सीमा के साथ कानून लागू किए हैं। तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात में 15 साल से कम उम्र पर रोक लगाने वाले कानून क्रमशः 2026 के अंत और अगले साल से लागू होंगे। चीन 2019 से चरणबद्ध प्रतिबंध लगा चुका है, जिसमें रात के समय ऑनलाइन गेम और बाद में सोशल मीडिया व स्ट्रीमिंग तक पहुंच सीमित की गई। यूरोपीय संघ (ईयू) के भीतर ग्रीस, स्वीडन, डेनमार्क, ऑस्ट्रिया और स्लोवेनिया समेत कई देश 14 से 16 साल की आयु सीमा वाले विधेयकों पर काम कर रहे हैं। भारत सरकार ने भी फरवरी में प्लेटफार्मों के साथ भविष्य की पाबंदियों पर चर्चा शुरू की है। ये कदम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और ऑनलाइन शोषण के बढ़ते खतरों से प्रेरित बताए जाते हैं।
सरकारों की इस सक्रियता के समानांतर, नियामक संस्थाएं प्लेटफार्मों के डिज़ाइन पर भी सवाल उठा रही हैं। यूरोपीय आयोग ने डिजिटल सेवा अधिनियम (डीएसए) के तहत मेटा के खिलाफ प्रारंभिक जांच में पाया कि इंस्टाग्राम और फेसबुक का डिज़ाइन ‘व्यसनकारी’ है। आयोग के अनुसार, ऑटोप्ले, अनंत स्क्रॉल और वैयक्तिकृत सिफारिशें उपयोगकर्ताओं को ‘ऑटोपायलट मोड’ में धकेलती हैं, जिससे अस्वस्थ आदतें बनती हैं। आयोग ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि मेटा ने रात में किशोरों द्वारा बिताए जाने वाले समय के आंकड़ों को नज़रअंदाज़ किया और अभिभावकीय नियंत्रण के मौजूदा उपाय अपर्याप्त हैं। वहीं, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (मेइटी) ने बीबीसी की एक जांच के बाद मेटा को नोटिस जारी कर इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े विज्ञापनों को हटाने और स्पष्टीकरण देने को कहा था। मेटा ने जवाब दिया है कि उसने ऐसे लाखों खाते और सामग्री हटाई हैं, और जानबूझकर ऐसा कोई काम नहीं किया; मंत्रालय फिलहाल जवाब की समीक्षा कर रहा है।
मेटा ने यूरोपीय आयोग के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि जांच में उसके द्वारा उठाए गए सुरक्षा कदमों को सही ढंग से नहीं आँका गया। कंपनी ने ‘किशोर खाते’ जैसी सुविधाओं का हवाला दिया, जो रात में पहुंच रोकती हैं और स्क्रीन समय सीमित करती हैं। फिर भी, आयोग का मानना है कि मेटा को अनिवार्य रूप से ऑटोप्ले और अनंत स्क्रॉल जैसे फीचर बंद करने चाहिए और सार्थक ‘स्क्रीन ब्रेक’ लागू करने चाहिए। यदि अंतिम निर्णय में उल्लंघन पुष्ट हुआ, तो मेटा पर उसके वैश्विक वार्षिक कारोबार का 6% तक जुर्माना लग सकता है।
भौगोलिक रूप से, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के कठोर राज्य नियंत्रण से लेकर ऑस्ट्रेलिया के प्रवर्तन-केंद्रित मॉडल तक, विविध दृष्टिकोण दिखाई देते हैं। हालांकि, रूसी मीडिया के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया के प्रतिबंध के शुरुआती नतीजे अपेक्षित सफलता नहीं दे पाए हैं, जो कार्यान्वयन की जटिलता को रेखांकित करता है। यूरोपीय संघ एक समरूप नियामक ढांचा बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि भारत जैसे देश अभी उद्योग के साथ परामर्श के चरण में हैं। ये सभी घटनाक्रम डिजिटल प्लेटफार्मों के लिए अनुपालन भार और जुर्माने का जोखिम बढ़ा रहे हैं।
ईयू आयोग को सोमवार को विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें मिलने वाली हैं, और आने वाले सप्ताहों में इस पर निर्णय संभावित है। फ्रांस में विधेयक का अंतिम प्रारूप सितंबर में आने की उम्मीद है, जबकि ब्रिटेन और कनाडा 2027 की शुरुआत से प्रतिबंध लागू करने की योजना बना रहे हैं। नॉर्वे और भारत समेत अन्य देशों में विधायी प्रक्रिया जारी है। इस प्रकार, नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर वैश्विक नीतिगत परिदृश्य तेजी से बदल रहा है।
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | 0.00 | neutral |
|---|---|---|
| रूसी और सीआईएस प्रेस | −0.30 | critical |
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | 0.00 | neutral |
The world is moving towards protecting minors online, with over 20 countries adopting restrictions.
The article relies on an objective count of countries and concrete examples, without evaluative commentary.
It does not mention criticisms or alternatives to prohibition, such as digital education.
Governments act on impulse, but results are disappointing and real priorities lie elsewhere.
The article juxtaposes the ban topic with a tech news item, suggesting media attention is scattered and the debate is unserious.
It omits the growing consensus among child protection advocates.
The debate is open: ban or educate? The Australian experience offers insights, but the solution is not one-size-fits-all.
The article presents the ban as one possible solution, contrasting it with education, and invites balanced reflection.
It does not mention that over 20 countries have already implemented concrete measures, reducing the debate to an open question.
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