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मीडिया और मनोरंजनरविवार, 12 जुलाई 2026

एस. जानकी: जब स्वरों का विस्तार भावों की सीमाएँ तोड़ दे

दक्षिण भारत की कोकिला एस. जानकी के निधन पर उनकी उस आवाज़ को याद किया गया जिसने छह दशकों तक हर भावना को सजीव किया और भाषाओं की दीवारें ढहा दीं।

1962 में मद्रास के एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में एक अनोखा संगीत-संयोग हुआ। कर्नाटक संगीत के नागस्वरम वादक करुकुरिची अरुणाचलम की धुन के साथ जब एस. जानकी ने 'सिंगारा वेलाने देवा' गाना शुरू किया, तो उनकी आवाज़ ने वाद्य की हर बारीकी को इस कदर आत्मसात किया कि श्रोता भूल गए कि ये दोनों अलग-अलग समय पर रिकॉर्ड हुए थे। यह गीत बाद में तमिल सिनेमा की सबसे बड़ी संगीत उपलब्धियों में गिना गया—और इसने एक ऐसी गायिका के आगमन की घोषणा की जिसके स्वर अगली छह दशकों तक करोड़ों लोगों की स्मृति में बसते चले गए।

11 जुलाई, 2026 को 88 वर्ष की आयु में मैसूरु के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे 'संगीत और संस्कृति की दुनिया के लिए अपूरणीय क्षति' बताया। आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में 1938 में जन्मी जानकी ने बचपन में ही संगीत की बारीकियाँ पकड़ ली थीं—बड़ी बहन के साथ उनके संगीत शिक्षक के पास जाने से शुरू हुआ यह सिलसिला आकाशवाणी की प्रतियोगिता जीतने तक पहुँचा। 1957 में तमिल फिल्म 'विधियिन विलायट्टु' से उन्होंने पार्श्व गायन की शुरुआत की और जल्द ही तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, हिंदी समेत क़रीब 17 भाषाओं में 48,000 से अधिक गीत रिकॉर्ड किए।

जानकी की आवाज़ महज़ स्वर नहीं थी—वह चरित्र की भावनाओं में ढल जाती थी। इलैयाराजा ने अपनी पहली ही फिल्म 'अन्नाकिली' से उन्हें अपना सबसे अभिव्यंजक माध्यम बनाया और साथ मिलकर ऐसे सैकड़ों गीत रचे जो आज भी संगीतप्रेमियों के मन में गूँजते हैं। '16 वयत्तिनिले' के 'सेंथूरा पूवे' ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया—यह फिल्म भी उन निर्देशक भारतीराजा की पहली फिल्म थी जिनका हाल ही में निधन हुआ। जानकी के लिए संगीत साधना था; जब एक बार भक्ति गीत रिकॉर्ड करने के बाद उन्होंने महसूस किया कि धुन ने उन्हें भीतर तक छू लिया है, तो उन्होंने अगला गीत शाम तक टाल दिया—कहा कि ऐसे गीत यूँ ही एक के बाद एक नहीं गाए जाते।

विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों से श्रद्धांजलियों में यह अहसास साझा था कि जानकी की आवाज़ किसी एक भाषा या प्रांत की मोहताज नहीं थी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने उन्हें 'तेलुगु मिट्टी की बेटी' कहा, जबकि केरल के संगीतकार विद्याधरन को उनका गाना सुनकर 'दिव्यता' का आभास हुआ। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने उनकी 'अद्वितीय आवाज़' को याद किया। गायिका चिन्मयी ने ऑस्ट्रेलिया में एक मंचीय प्रस्तुति का वाकया साझा किया, जब वे परदे के पीछे से नहीं पहचान पाई थीं कि इतना गहरा और शक्तिशाली स्वर किसी पुरुष का है या स्त्री का—बाद में पता चला कि यह जानकी अम्मा की आवाज़ थी। यह उनकी पहुँच की वैश्विकता ही थी कि मलेशिया और खाड़ी देशों में बसे दक्षिण भारतीय भी उनके गीतों को अपनी पहचान का हिस्सा मानते थे।

इस बीच निधनों का दौर था—भारतीराजा, के. भाग्यराज और अब जानकी। लेकिन उनके स्वर आज भी कहीं 'मौनमे' की उदासी में, कहीं 'चिन्ना तयावल' की ममता में और कहीं 'गोपाल गोपाल' की चंचलता में जीवित हैं। उनकी आवाज़ की तारीफ करते हुए एक संगीतज्ञ ने कहा था कि उसमें सहज ही तानपुरे की गूँज सुनाई पड़ती थी। और शायद यही गूँज अब भी लाखों घरों में बज रहे उनके गीतों में मौजूद है—यह साबित करते हुए कि सच्ची कला की प्रतिध्वनि कभी नहीं मिटती।

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10%कम
2 ब्लॉक · स्थिति +0.60 से +0.80 तक
आलोचनात्मकसमर्थक
INDGLF
प्रेस ब्लॉकों के बीच विचलन
भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस+0.80aligned
अरब खाड़ी प्रेस+0.60aligned
भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस+0.80
स्वर

South India mourns its 'Nightingale', a mother to all, whose voice is a timeless treasure.

तंत्रpersonificazione della figura pubblica

Through personal anecdotes and affectionate terms like 'Amma', the singer is humanized and made part of the national family, turning her death into an intimate collective grief.

विजयसंरक्षणवाद
अरब खाड़ी प्रेस+0.60
स्वर

India loses a cultural icon, but the whole world pays homage to her timeless voice.

तंत्रuniversalizzazione

By selecting tributes from national and international figures, the singer is elevated to a global symbol, while local and personal details are downplayed.

चूक

Local anecdotes and personal memories of ordinary fans, which characterize the Indian coverage, are omitted; the regional and intimate dimension of her legacy is overlooked.

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एस. जानकी: जब स्वरों का विस्तार भावों की सीमाएँ तोड़ दे

दक्षिण भारत की कोकिला एस. जानकी के निधन पर उनकी उस आवाज़ को याद किया गया जिसने छह दशकों तक हर भावना को सजीव किया और भाषाओं की दीवारें ढहा दीं।

1962 में मद्रास के एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में एक अनोखा संगीत-संयोग हुआ। कर्नाटक संगीत के नागस्वरम वादक करुकुरिची अरुणाचलम की धुन के साथ जब एस. जानकी ने 'सिंगारा वेलाने देवा' गाना शुरू किया, तो उनकी आवाज़ ने वाद्य की हर बारीकी को इस कदर आत्मसात किया कि श्रोता भूल गए कि ये दोनों अलग-अलग समय पर रिकॉर्ड हुए थे। यह गीत बाद में तमिल सिनेमा की सबसे बड़ी संगीत उपलब्धियों में गिना गया—और इसने एक ऐसी गायिका के आगमन की घोषणा की जिसके स्वर अगली छह दशकों तक करोड़ों लोगों की स्मृति में बसते चले गए।

11 जुलाई, 2026 को 88 वर्ष की आयु में मैसूरु के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे 'संगीत और संस्कृति की दुनिया के लिए अपूरणीय क्षति' बताया। आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में 1938 में जन्मी जानकी ने बचपन में ही संगीत की बारीकियाँ पकड़ ली थीं—बड़ी बहन के साथ उनके संगीत शिक्षक के पास जाने से शुरू हुआ यह सिलसिला आकाशवाणी की प्रतियोगिता जीतने तक पहुँचा। 1957 में तमिल फिल्म 'विधियिन विलायट्टु' से उन्होंने पार्श्व गायन की शुरुआत की और जल्द ही तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, हिंदी समेत क़रीब 17 भाषाओं में 48,000 से अधिक गीत रिकॉर्ड किए।

जानकी की आवाज़ महज़ स्वर नहीं थी—वह चरित्र की भावनाओं में ढल जाती थी। इलैयाराजा ने अपनी पहली ही फिल्म 'अन्नाकिली' से उन्हें अपना सबसे अभिव्यंजक माध्यम बनाया और साथ मिलकर ऐसे सैकड़ों गीत रचे जो आज भी संगीतप्रेमियों के मन में गूँजते हैं। '16 वयत्तिनिले' के 'सेंथूरा पूवे' ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया—यह फिल्म भी उन निर्देशक भारतीराजा की पहली फिल्म थी जिनका हाल ही में निधन हुआ। जानकी के लिए संगीत साधना था; जब एक बार भक्ति गीत रिकॉर्ड करने के बाद उन्होंने महसूस किया कि धुन ने उन्हें भीतर तक छू लिया है, तो उन्होंने अगला गीत शाम तक टाल दिया—कहा कि ऐसे गीत यूँ ही एक के बाद एक नहीं गाए जाते।

विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों से श्रद्धांजलियों में यह अहसास साझा था कि जानकी की आवाज़ किसी एक भाषा या प्रांत की मोहताज नहीं थी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने उन्हें 'तेलुगु मिट्टी की बेटी' कहा, जबकि केरल के संगीतकार विद्याधरन को उनका गाना सुनकर 'दिव्यता' का आभास हुआ। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने उनकी 'अद्वितीय आवाज़' को याद किया। गायिका चिन्मयी ने ऑस्ट्रेलिया में एक मंचीय प्रस्तुति का वाकया साझा किया, जब वे परदे के पीछे से नहीं पहचान पाई थीं कि इतना गहरा और शक्तिशाली स्वर किसी पुरुष का है या स्त्री का—बाद में पता चला कि यह जानकी अम्मा की आवाज़ थी। यह उनकी पहुँच की वैश्विकता ही थी कि मलेशिया और खाड़ी देशों में बसे दक्षिण भारतीय भी उनके गीतों को अपनी पहचान का हिस्सा मानते थे।

इस बीच निधनों का दौर था—भारतीराजा, के. भाग्यराज और अब जानकी। लेकिन उनके स्वर आज भी कहीं 'मौनमे' की उदासी में, कहीं 'चिन्ना तयावल' की ममता में और कहीं 'गोपाल गोपाल' की चंचलता में जीवित हैं। उनकी आवाज़ की तारीफ करते हुए एक संगीतज्ञ ने कहा था कि उसमें सहज ही तानपुरे की गूँज सुनाई पड़ती थी। और शायद यही गूँज अब भी लाखों घरों में बज रहे उनके गीतों में मौजूद है—यह साबित करते हुए कि सच्ची कला की प्रतिध्वनि कभी नहीं मिटती।

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Through personal anecdotes and affectionate terms like 'Amma', the singer is humanized and made part of the national family, turning her death into an intimate collective grief.

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India loses a cultural icon, but the whole world pays homage to her timeless voice.

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By selecting tributes from national and international figures, the singer is elevated to a global symbol, while local and personal details are downplayed.

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