
इंडोनेशिया में आवास नीति में बड़ा बदलाव, ईरान-इज़राइल में भी आर्थिक राहत की पहल
दुनिया भर में सरकारें कमज़ोर तबके को राहत देने के लिए नीतिगत बदलाव कर रही हैं, इंडोनेशिया से लेकर ईरान तक आवास, ब्याज दर और खाद्य सब्सिडी पर नए कदम।
दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इंडोनेशिया में सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी 'तीन करोड़ घर' योजना को गति देने के लिए निम्न-आय वर्ग (एमबीआर) की परिभाषा में ढील देने और अधिवास संबंधी बाधाओं को हटाने का निर्णय लिया है। गृह मंत्री मुहम्मद तीतो कर्नावियन और आवास मंत्री मारुआरार सिराइत के बीच सहमति बनी है कि अविवाहित लोगों के लिए अधिकतम मासिक आय की सीमा 70 लाख रुपिये से बढ़ाकर 85 लाख रुपिये की जाएगी। इसके साथ ही, कार्यक्रम का लाभ उठाने के लिए अब पहचान-पत्र पर दर्ज पते तक सीमित रहना अनिवार्य नहीं होगा, जिससे प्रवासी श्रमिकों और शहरी ग़रीबों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
इंडोनेशियाई गृह मंत्रालय ने समानांतर रूप से कई अन्य मोर्चों पर हस्तक्षेप किया है। सुमात्रा में बाढ़ व भूस्खलन जैसी जलवायु आपदाओं के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण कार्यों में तेज़ी लाने के लिए एक विशेष कार्यबल सक्रिय किया गया है, ताकि प्रभावित परिवार लंबे समय तक कठिनाई में न रहें। दूसरी ओर, मंत्रालय ने स्थानीय सरकारों को फ़ीफ़ा विश्व कप 2026 के सामूहिक प्रसारण की सुविधा देने का परिपत्र जारी किया है, ताकि छोटे कारोबारों और स्थानीय समुदायों को आर्थिक गति मिले। जकार्ता में 'बेदाह रुमाह' (गृह-उद्धार) योजना के तहत अब कम आय वाले परिवारों की दुकानों की मरम्मत भी शामिल कर ली गई है, और सामग्री खरीद में पारदर्शिता लाने के लिए 'खुली दुकान चयन' प्रणाली अपनाई गई है। इन सबके बीच, गृह मंत्री ने सांख्यिकी ब्यूरो के साथ आर्थिक जनगणना 2026 के आँकड़ों को नीति-निर्माण का आधार बनाने के लिए एक संयुक्त परिपत्र पर हस्ताक्षर किए, जो साक्ष्य-आधारित शासन की दिशा में एक ठोस क़दम है।
पश्चिम एशिया में भी आर्थिक दबाव झेल रहे तबकों को राहत देने की कोशिशें तेज़ हुई हैं। इज़राइल के वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मोट्रिच ने केंद्रीय बैंक से ब्याज दर में तीव्र कटौती की सार्वजनिक माँग की है, ताकि गिरवी और ऋणों की लागत घट सके और परिवारों व कारोबारों को साँस लेने की जगह मिले। उनका तर्क है कि मुद्रास्फीति के अनुकूल आँकड़ों के बावजूद बैंक ने दर घटाने में देरी की, जिससे विकास की रफ़्तार प्रभावित हुई। वहीं ईरान में सरकार इलेक्ट्रॉनिक खाद्य कूपन (कालाबर्ग) की राशि बढ़ाने और वितरण प्रणाली को फिर से आय-आधारित दस-स्तरीय वर्गीकरण पर लौटाने की तैयारी कर रही है। अर्थव्यवस्था मंत्री ने आश्वासन दिया है कि अगले दो सप्ताह में अंतिम प्रस्ताव पेश किया जाएगा, जिससे छह निचले आय-वर्गों को प्राथमिकता मिलेगी।
ये तमाम घटनाक्रम एक व्यापक वैश्विक रुझान की ओर इशारा करते हैं, जिसमें सरकारें पारंपरिक कल्याणकारी उपायों को समकालीन चुनौतियों के अनुरूप ढाल रही हैं। दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत, के लिए इन प्रयोगों में सीखने लायक कई पहलू हैं। भारत की प्रधानमंत्री आवास योजना में भी आय सीमा और प्रवासी लाभार्थियों की पहचान को लेकर ऐसी ही बहसें चल रही हैं, जबकि रिज़र्व बैंक के सामने ब्याज दरों को लेकर विकास और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन साधने की चुनौती बनी हुई है। लक्षित खाद्य सब्सिडी का ईरानी मॉडल भी भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार की चर्चा को नया सिरे से सोचने का अवसर देता है। आने वाले महीनों में इन नीतियों के नतीजे यह तय करेंगे कि क्या ये महज़ अल्पकालिक राहत बनकर रह जाएँगी या समावेशी विकास की दिशा में स्थायी क़दम साबित होंगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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इंडोनेशियाई सरकार आवास कार्यक्रमों तक पहुंच बढ़ाकर सामाजिक सुरक्षा जाल को पुनर्संतुलित कर रही है। निम्न-आय की परिभाषा को बढ़ाया जा रहा है और निवास संबंधी बाधाओं को हटाया जा रहा है ताकि तीन मिलियन घरों की योजना का लाभ अधिक नागरिकों तक पहुंचे। इस कदम को आर्थिक दबाव के बीच कल्याण को अधिक समावेशी बनाने के लिए एक व्यावहारिक समायोजन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इज़राइल के वित्त मंत्री सार्वजनिक रूप से केंद्रीय बैंक पर ब्याज दरों में तेज और तत्काल कटौती करने का दबाव डाल रहे हैं, यह तर्क देते हुए कि सकारात्मक मुद्रास्फीति आंकड़े किसी बहाने की गुंजाइश नहीं छोड़ते। यह मांग मौद्रिक नीति के प्रति तात्कालिकता और हताशा व्यक्त करती है, तथा इस विलंब को एक ऐसी गलती बताती है जो परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ाती है।
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