
लेबनान पर अमेरिका-ईरान समझौते का विवाद: अराकची ने बेरूत को दी सीधी जानकारी
ईरानी विदेश मंत्री ने लेबनानी नेतृत्व को बताया कि समझौते में लेबनान की संप्रभुता और युद्धविराम शामिल है, जबकि अमेरिकी स्रोतों ने इससे इनकार किया था।
ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए एक अहम कूटनीतिक समझौते ने लेबनान को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। लेबनानी राष्ट्रपति जोसेफ औन ने ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराकची के साथ टेलीफोन पर बातचीत में इस समझौते का स्वागत किया और उम्मीद जताई कि यह क्षेत्रीय तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान का रास्ता खोलने में सकारात्मक कदम साबित होगा। हालांकि, इसी बीच अल-जजीरा की एक रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया गया कि इस समझौते में लेबनान शामिल नहीं है, जिसे ईरानी वार्ता टीम के करीबी सूत्रों ने सिरे से खारिज कर दिया।
ईरानी पक्ष के अनुसार, इस्लामाबाद में हुई वार्ता के अंतिम चरणों में समझौता ज्ञापन में "लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान" संबंधी एक प्रावधान जोड़ा गया। विदेश मंत्री अराकची ने राष्ट्रपति औन और संसद अध्यक्ष नबीह बेरी को अलग-अलग फोन कर इसकी विस्तृत जानकारी दी और इस बात पर जोर दिया कि लेबनान पर युद्ध समाप्त करने का यह खंड तुरंत और पूरी 60 दिनों की बातचीत अवधि के दौरान सख्ती से लागू होना चाहिए। उन्होंने अमेरिका को इसके कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार ठहराया और इजरायल द्वारा लेबनान पर हमलों की पूर्ण समाप्ति की अनिवार्यता रेखांकित की। गौरतलब है कि इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने इस समझौते पर नाराजगी जताते हुए कहा कि "हम लेबनान से पीछे नहीं हटेंगे।"
लेबनानी नेतृत्व ने इस कूटनीतिक पहल का सतर्क लेकिन सकारात्मक स्वागत किया। राष्ट्रपति औन ने कहा कि लेबनान की स्थिरता, सुरक्षा और संप्रभुता राष्ट्रीय प्राथमिकता बनी रहेगी और उन्होंने लेबनानी जनता से वर्तमान नाजुक दौर में एकता और सूझबूझ बनाए रखने की अपील की। उन्होंने समझौते में लेबनान की विशिष्टता को स्वीकार किए जाने की सराहना की। संसद अध्यक्ष बेरी ने ईरान और अन्य क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय समर्थकों का आभार जताया और इस बात पर बल दिया कि लेबनान की सुरक्षा किसी भी गंभीर क्षेत्रीय स्थिरता प्रयास का अभिन्न अंग है।
यह घटनाक्रम पश्चिम एशिया में व्यापक तनाव कम करने की संभावनाओं को रेखांकित करता है, लेकिन लेबनान को शामिल किए जाने पर विवाद इसकी नाजुकता भी दर्शाता है। भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह मामला विशेष महत्व रखता है, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र और लेबनान में स्थिरता ऊर्जा आपूर्ति और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा से सीधे जुड़ी है। इस्लामाबाद में हुई वार्ता पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका को भी रेखांकित करती है। आने वाले 60 दिनों की बातचीत अवधि यह तय करेगी कि क्या यह समझौता ज्ञापन वास्तविक युद्धविराम और स्थायी क्षेत्रीय शांति की ओर ले जाता है, या महज एक और कागजी सहमति बनकर रह जाता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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लेबनानी नेतृत्व ने ईरान-अमेरिका ज्ञापन का स्वागत किया और इसे तनाव कम करने तथा सुरक्षा और स्थिरता बढ़ाने के लिए राजनयिक समाधानों का रास्ता खोलने वाला एक सकारात्मक कदम माना। उन्होंने जोर दिया कि लेबनान की संप्रभुता, सुरक्षा और स्थिरता राष्ट्रीय प्राथमिकता है और क्षेत्रीय चुनौतियों के बीच लेबनानी हितों की रक्षा के लिए राजनयिक प्रयास जारी रहने चाहिए।
लेबनानी राष्ट्रपति औन ने वृद्धि को रोकने और युद्धविराम को मजबूत करने के उपलब्ध अवसर का लाभ उठाने की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे अमेरिका और इज़राइल के साथ आगे की वार्ता का मार्ग प्रशस्त हो। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और नाजुक चरण के प्रति जागरूकता का आह्वान किया, साथ ही ईरान-अमेरिका ज्ञापन का स्वागत किया जिसमें लेबनान शामिल है।
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