
सीआईए प्रमुख ने ट्रंप को आगाह किया: ईरान परमाणु समझौते पर गंभीर नहीं
अमेरिकी खुफिया एजेंसी के संदेह के बावजूद प्रशासन ने जिनेवा में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, आंतरिक मतभेद उजागर।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते की घोषणा के ठीक पहले, सीआईए निदेशक जॉन रैटक्लिफ ने व्हाइट हाउस के शीर्ष अधिकारियों को गुप्तचर आकलन से अवगत कराया कि तेहरान अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर कोई ठोस रियायत देने को तैयार नहीं है। एक्सिओस की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने ऐसे संवाद इंटरसेप्ट किए हैं जिनमें ईरानी अधिकारी आपस में जो बातें कर रहे हैं, वे मध्यस्थों और अमेरिका के समक्ष रखे गए आश्वासनों से मेल नहीं खातीं। यह चेतावनी महज एक संस्थागत संदेह नहीं थी; इसने ट्रंप प्रशासन के भीतर गहरे विभाजन को उजागर कर दिया।
विदेश मंत्री मार्को रूबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी आंतरिक बैठकों में इसी आशंका को दोहराया, जबकि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ व जेरेड कुशनर ने समझौते को आगे बढ़ाने का समर्थन किया। यह बहस ऐसे समय हुई जब वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक प्रारंभिक समझौता ज्ञापन पर डिजिटल हस्ताक्षर हो चुके थे, जिसे अब जिनेवा में औपचारिक रूप दिया जाना है। इसके बाद 60 दिनों की एक निर्णायक वार्ता अवधि शुरू होगी, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विस्तृत चर्चा होनी है।
यूरोपीय और मध्य पूर्वी मीडिया में भी इस खुफिया चेतावनी को प्रमुखता से उठाया गया। स्वीडन के आफ्टनब्लाडेट ने सीआईए की आशंका को 'ईरान झांसा दे रहा है' शीर्षक से प्रकाशित किया, जबकि रूसी मीडिया ने इसे इस बात का प्रमाण बताया कि मास्को भी तेहरान की मंशा पर सवाल उठा रहा है। अरब और इतालवी स्रोतों ने इस आंतरिक मतभेद को रेखांकित करते हुए बताया कि ट्रंप ने सभी पक्षों को सुना, लेकिन अंततः समझौते की दिशा में कदम बढ़ाया। यह वैश्विक दृष्टिकोण दर्शाता है कि ईरान की विश्वसनीयता पर संदेह केवल वाशिंगटन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक कूटनीतिक चिंता बन चुकी है।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए, इस घटनाक्रम के दोहरे आयाम हैं। एक ओर, यदि ईरान वास्तव में परमाणु रियायतों से पीछे हटता है, तो पश्चिमी प्रतिबंधों के सख्त होने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, क्योंकि ईरान भारत का एक प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। दूसरी ओर, चाबहार बंदरगाह परियोजना, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की रणनीतिक पहुंच का प्रवेशद्वार है, अमेरिकी प्रतिबंधों से छूट पर निर्भर करती है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन का ईरान के प्रति रुख सीधे भारत की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को प्रभावित करेगा।
आगे की राह अनिश्चितताओं से भरी है। खुफिया रिपोर्ट यह संकेत देती है कि ईरान शायद समय खरीदने या प्रतिबंधों में ढील पाने के लिए बातचीत को लंबा खींचना चाहता है, जबकि उसका परमाणु ढांचा यथावत बना रहे। जिनेवा में होने वाली 60 दिन की वार्ता इस बात की असली कसौटी होगी कि क्या ट्रंप की कूटनीति ईरान को सत्यापन योग्य प्रतिबद्धताओं तक ले जा सकती है, या फिर सीआईए की चेतावनी सही साबित होगी। वैश्विक समुदाय, खासकर भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश, इस प्रक्रिया को सतर्क आशा के साथ देख रहे हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने सबूत जुटाए हैं कि ईरान वास्तव में परमाणु रियायतें देने को तैयार नहीं है, घोषित समझौते के बावजूद। सीआईए निदेशक ने राष्ट्रपति ट्रंप को व्यक्तिगत रूप से चेतावनी दी कि ईरानी आंतरिक चर्चाएं उनकी सार्वजनिक प्रतिबद्धताओं का खंडन करती हैं। इससे तेहरान के वास्तविक इरादों और किसी भी समझौते की व्यवहार्यता पर गंभीर सुरक्षा चिंताएं पैदा होती हैं।
सूत्रों ने ईरान के साथ समझौता ज्ञापन को लेकर ट्रंप प्रशासन के भीतर मतभेद का खुलासा किया, क्योंकि सीआईए प्रमुख ने वाशिंगटन द्वारा मांगी गई परमाणु रियायतें देने की तेहरान की तत्परता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया। खुफिया जानकारी बताती है कि ईरानी अधिकारी आंतरिक रूप से जो कहते हैं और मध्यस्थों को जो बताते हैं, उसमें अंतर है। प्रमुख कैबिनेट सदस्य भी यह संदेह साझा करते हैं, जिससे समझौते के भविष्य पर अनिश्चितता बनी हुई है।
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