
जब सुपरमार्केट में बच्चों के नहीं, बड़ों के डायपर आगे आ गए
जापान के एक स्टोर की शेल्फ से लेकर कोलंबिया के स्कूलों के बंद होते दरवाज़ों तक, दुनिया एक खामोश सांस्कृतिक पुनर्संरचना के दौर से गुज़र रही है।
टोक्यो के एक साधारण से सुपरमार्केट में, बेबी केयर गलियारे के ठीक बगल में, अब एडल्ट डायपर के पैकेटों की कतारें ज़्यादा लंबी नज़र आती हैं। यह कोई विज्ञान कथाकार की कल्पना नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बुज़ुर्ग देश का एक सच्चा ब्योरा है—वहाँ शिशुओं के लंगोट से ज़्यादा बड़ों के लंगोट बिकने लगे हैं। यह एक ऐसी तस्वीर है जो सिर्फ़ जापान की नहीं, बल्कि एक ऐसे वैश्विक मोड़ की है जहाँ पालने खाली हो रहे हैं और कक्षाएँ सिकुड़ रही हैं।
कोलंबिया में यह बदलाव स्कूलों के रजिस्टरों में दर्ज है। वहाँ 2015 से 2025 के बीच प्री-स्कूल से लेकर हाईस्कूल तक करीब साढ़े नौ लाख विद्यार्थी गायब हो गए। दिलचस्प यह है कि यह गिरावट सिर्फ़ कम बच्चे पैदा होने से नहीं समझाई जा सकती—तीन से पाँच साल की आबादी महज़ दो फ़ीसदी घटी, जबकि दाखिले लगभग आठ फ़ीसदी गिर गए। यानी सैकड़ों हज़ार बच्चे ऐसे हैं जो पैदा तो हुए, लेकिन कक्षा में कभी नहीं पहुँचे। कुछ परिवारों ने होमस्कूलिंग का रास्ता चुना, कुछ किशोर आर्थिक मजबूरियों में काम पर चले गए, और कुछ युवा पढ़ाई के लिए ही स्पेन, ऑस्ट्रेलिया या जर्मनी चले गए।
लैटिन अमेरिका का एक और छोर, अर्जेंटीना, इसी कहानी को आर्थिक आईने में देखता है। वहाँ प्रजनन दर 1.3 बच्चे प्रति महिला रह गई है, और अनुमान है कि 2050 तक 65 साल से ऊपर की आबादी बीस फ़ीसदी छू लेगी। लेकिन इस बुज़ुर्ग होती दुनिया ने एक नई अर्थव्यवस्था को भी जन्म दिया है—‘सिल्वर इकॉनमी’। जापान में खिलौने बनाने वाली कंपनियों ने बुज़ुर्गों के उत्पादों की लाइनें शुरू कर दीं, और यूरोपीय संघ में 65 से ऊपर के लोग निजी संपत्ति के आधे से ज़्यादा हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं। यह कोई संकट नहीं, बल्कि उपभोग, आवास और श्रम बाज़ार की एक मूक पुनर्रचना है।
नॉर्डिक देशों में यह बहस एक अलग रंग लेती है। स्वीडन में सरकार ने आईवीएफ़ उपचारों की सब्सिडी दोगुनी कर दी, ताकि गिरती जन्मदर को थामा जा सके, लेकिन आलोचक इसे लक्षणों का इलाज बताते हैं, कारणों का नहीं। वहीं वामपंथी दल माता-पिता की छुट्टी को बराबर बाँटने पर ज़ोर देते हैं, जिसे कई महिलाएँ अपनी पसंद की आज़ादी पर हमला मानती हैं। एक विरोधाभास सामने आता है: जैसे-जैसे आर्थिक बाधाएँ घटती हैं, स्त्री-पुरुष अपनी मर्ज़ी से पारंपरिक पेशे चुनते हैं—इसे ‘जेंडर समानता का विरोधाभास’ कहा जाता है। कनाडा के क्यूबेक प्रांत में जनसंख्या वृद्धि धीमी पड़ने के अनुमानों के बीच, मॉन्ट्रियल द्वीप की आबादी 2051 तक 2016 के स्तर पर लौटने की संभावना है, जबकि गास्पेसी जैसे सुदूर इलाके ग्यारह फ़ीसदी तक सिकुड़ सकते हैं।
इन सब आँकड़ों के पीछे एक साझा सांस्कृतिक स्पंदन है—भविष्य में आस्था का क्षरण। कोलंबिया के एक विश्लेषण में कहा गया कि बच्चा पैदा करना अंततः एक आस्था का कार्य है, और जब यह आस्था बुझती है तो कोई सांख्यिकी उसकी जगह नहीं ले सकती। नॉरशोपिंग में मानसिक रूप से बीमार लोगों के लिए काम करने वाले ‘पर्सनल ओम्बड्समैन’ की सेवाएँ काटी जा रही हैं, उनकी फ़ोन लाइन हफ़्ते में सिर्फ़ चार घंटे के लिए खुलती है—एक और जगह जहाँ सहारा खामोशी से सिमट रहा है। कोलंबिया के एक छोटे से स्कूल में एक कक्षा का कमरा इस साल बंद कर दिया गया, उसकी खिड़कियों से अब कोई आवाज़ नहीं आती।
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.50 | critical |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.10 | neutral |
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.10 | neutral |
Latin American society wakes up late to a silent demographic emergency.
Statistical data are presented as an inescapable truth, creating a sense of urgency that pushes for action.
It does not mention immigration as a possible solution nor natalist policies.
European political debate focuses on technical and ideological solutions to reverse the birth decline.
The issue is framed as a matter of political choices, pitting state intervention against individual freedom.
It does not address overall demographic data nor the impact on the school system.
In the US and Quebec, demographic decline becomes a lever for immediate political battles.
By linking demography to electoral and immigration issues, attention shifts from root causes to power struggles.
It does not consider the direct experience of families and students in empty classrooms.
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