
ओलंपिक जिमनास्ट से डॉक्टर तक: नाबालिगों के विरुद्ध यौन अपराधों पर वैश्विक न्यायिक रुख
अर्जेंटीना में पूर्व ओलंपियन को ग्रूमिंग का दोषी ठहराया गया, वहीं भारतीय उच्च न्यायालय ने स्तन दबाने को नियमित जांच नहीं माना—दोनों मामलों में नाबालिगों के प्रति यौन हिंसा पर सख्त कानूनी प्रतिक्रिया सामने आई।
अर्जेंटीना की एक अदालत ने पूर्व ओलंपिक जिमनास्ट फेडरिको मोलिनारी को एक नाबालिग छात्रा के साथ ऑनलाइन यौन शोषण (ग्रूमिंग) के आरोप में एक वर्ष आठ माह की सशर्त कारावास की सजा सुनाई। सैन इसिड्रो की न्यायाधीश मारिएला क्विंटाना ने यह फैसला सुनाते हुए दोषी को पीड़िता से दूर रहने, मनोवैज्ञानिक उपचार कराने और दो वर्ष तक निगरानी में रहने का आदेश दिया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मोलिनारी ने 2020 में अपने जिम में प्रशिक्षण ले रही 15 वर्षीय किशोरी को इंस्टाग्राम पर आपत्तिजनक संदेश भेजे और ‘एफेमेरल मोड’ सक्रिय करने को कहा ताकि सबूत मिट सकें। पीड़िता द्वारा मनोवैज्ञानिक सहायता लेने के बाद 2023 में मां ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद विशेष लैंगिक शोषण निरोधक अभियोजन इकाई ने मामले को मुकदमे तक पहुंचाया।
पीड़िता की अधिवक्ता मारिया एमिलिया गार्सिया मार्केज़ ने सजा को ‘क्षति की गंभीरता के अनुरूप नहीं’ बताया, लेकिन इस बात पर संतोष जताया कि अदालत ने अपराध और आरोपी की जिम्मेदारी को मान्यता दी। ग्रूमिंग अर्जेंटीना फाउंडेशन के निदेशक हर्नान नवारो ने कहा कि ये अपराध किसी खास प्रोफाइल तक सीमित नहीं हैं और खेल, शिक्षा या धार्मिक संस्थानों जैसे भरोसे के किसी भी माहौल में हो सकते हैं। दूसरी ओर, भारत के गौहाटी उच्च न्यायालय ने एक 17 वर्ष पुराने मामले में चिकित्सक की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि नाबालिग मरीज के स्तन दबाना ‘नियमित स्त्री रोग जांच’ नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने आरोपी की अधिक आयु को देखते हुए कारावास की जगह 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया और वह राशि पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना में भेजने का निर्देश दिया।
अर्जेंटीना के आपराधिक संहिता के अनुच्छेद 131 के तहत ग्रूमिंग में छह माह से चार वर्ष तक की सजा का प्रावधान है, लेकिन व्यवहार में अधिकतर सशर्त सजाएं दी जाती हैं। मेंडोज़ा प्रांत में एक 18 वर्षीय युवक को 12 वर्षीय बच्ची को फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट से यौन संदेश भेजने पर छह माह की निलंबित सजा मिली, जो इसी कानूनी ढांचे के अंतर्गत आता है। स्वीडन की एक अदालत ने माल्मो के 22 वर्षीय युवक को एक विकलांग महिला से बलात्कार और एक नाबालिग को यौन सामग्री भेजने के लिए उकसाने के प्रयास में साढ़े तीन वर्ष के कारावास की सजा सुनाई; अदालत ने आरोपी की बौद्धिक अक्षमता को दोषसिद्धि पर प्रभाव नहीं डालने दिया। इन विविध न्यायिक परिणामों से एक साझा संकेत मिलता है कि डिजिटल या भौतिक माध्यम से नाबालिगों के प्रति यौन अपराधों को गंभीरता से लिया जा रहा है, भले ही सजा का स्तर अलग-अलग हो।
लैटिन अमेरिकी बाल अधिकार संगठनों के अनुसार, खेल संस्थानों की निष्क्रियता चिंताजनक है और किसी भी संकेत पर तत्काल कार्रवाई अनिवार्य होनी चाहिए। अर्जेंटीना में पिछले वर्ष डिजिटल माध्यमों से नाबालिगों के विरुद्ध यौन अपराधों में 73.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो इस समस्या की बढ़ती गंभीरता को रेखांकित करता है। मोलिनारी मामले में अब दोषी दो वर्ष तक निगरानी में रहेगा और शर्तों के उल्लंघन पर कारावास भुगतना पड़ सकता है; भारतीय मामले में चिकित्सक को जुर्माना अदा करना है और स्वीडन का दोषी साढ़े तीन वर्ष की जेल काट रहा है। ये सभी मामले इस बात की पुष्टि करते हैं कि न्यायपालिकाएं पीड़ित के विश्वास और शारीरिक स्वायत्तता के हनन को कानूनी संरक्षण के केंद्र में रख रही हैं।
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.20 | neutral |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | 0.00 | neutral |
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | −0.70 | critical |
Argentine justice convicts the former gymnast for grooming, but the conditional sentence allows him to avoid prison, presented as a normal procedural outcome.
By describing the sentence without commentary on its severity, the bloc normalizes the conditional penalty as a standard judicial resolution.
It does not question whether the conditional sentence is adequate for grooming a minor, nor compares it to similar sentences.
The Swedish court sentences the man to prison, acknowledging his disability but still imposing a significant term, reflecting a balanced approach.
The report presents the sentence as a routine outcome of the legal process, with no emotional language, thereby reinforcing the legitimacy of the judicial system.
It does not discuss the victim's perspective or any broader societal issues regarding child sexual exploitation in Sweden.
गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने एक डॉक्टर की सजा को एक नाबालिग को छूने के लिए एक मामूली जुर्माने में बदल दिया, इस तथ्य के बावजूद कि यह कार्य चिकित्सा नहीं था, जो बाल संरक्षण को कमजोर करने वाली न्यायिक उदारता का संकेत देता है।
अदालत के अपने बयान कि यह कार्य जांच का हिस्सा नहीं था, को न्यूनतम दंड के साथ जोड़कर, ब्लॉक एक विरोधाभास को उजागर करता है जो सजा को अवैध ठहराता है।
यह सजा में कमी के लिए अदालत के किसी भी औचित्य, जैसे डॉक्टर की उम्र या साफ रिकॉर्ड, को छोड़ देता है ताकि आलोचना को मजबूत किया जा सके।
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