
दो मोर्चों पर नागरिक हताहत: संयुक्त राष्ट्र ने अफगान-पाक संघर्ष और फिलिस्तीन में हिंसा पर चिंता जताई
पाकिस्तानी हवाई हमलों में कम से कम 28 नागरिक मारे जाने और पश्चिमी तट पर इजरायली बस्तियों के विस्तार की निंदा के बीच, संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के पालन का आग्रह किया।
अफगानिस्तान के पूर्वी प्रांतों पकतिया, पकतिका और कुनर में 29 जून की रात पाकिस्तानी वायु सेना के हवाई हमलों में कम से कम 28 नागरिकों की मौत हो गई और 49 अन्य घायल हो गए। संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (यूनामा) ने पुष्टि की कि मृतकों में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। इसके बाद महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने तत्काल हिंसा रोकने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आह्वान किया। यूनामा के अनुसार, हमलों से कुछ इलाकों में विस्थापन भी हुआ है और मानवीय एजेंसियां आपात सहायता की तैयारी कर रही हैं।
इस घटना पर क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं तीखी रहीं। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने इसे “कायरतापूर्ण कृत्य” और नागरिक आवासों को निशाना बनाने वाला “अत्याचार” बताया, जबकि पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने दावा किया कि यह कार्रवाई कराची में अर्धसैनिक बलों पर हुए आत्मघाती हमले के जवाब में की गई, जिसमें 29 आतंकवादी मारे गए। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस हमले को “अफगानिस्तान की संप्रभुता पर सीधा हमला और क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा” करार देते हुए पाकिस्तान की “अपनी आंतरिक विफलताओं को हिंसा के जरिये सीमा पार प्रक्षेपित करने की निरर्थक कोशिश” बताया। रूसी विदेश मंत्रालय ने भी सशस्त्र संघर्ष समाप्त करने और राजनीतिक-राजनयिक तरीकों से विवाद सुलझाने का आह्वान किया।
इसी सप्ताह, संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने एक रिपोर्ट में अधिकृत पश्चिमी तट पर इजरायली बस्तियों के “अविरल विस्तार और त्वरण” की निंदा की और चेतावनी दी कि ई1 जैसी परियोजनाएं फिलिस्तीनी राज्य की व्यवहार्यता के लिए खतरा हैं। रिपोर्ट में बस्तियों के विस्तार के साथ-साथ यहूदी बाशिंदों की हिंसा और फिलिस्तीनियों की जमीन तक पहुंच पर प्रतिबंधों की निंदा की गई। इजरायली मानवाधिकार संगठन बी’त्सेलेम ने आरोप लगाया कि पश्चिमी तट पर फिलिस्तीनी बच्चों की हत्या की दर लगभग छह दशकों में सबसे अधिक है और यह कोई “पृथक गलतियां” नहीं बल्कि एक व्यापक नीति का परिणाम है। वहीं गाजा पट्टी में युद्धविराम की घोषणा के बाद से इजरायली हमलों में एक हजार से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, और महासचिव ने वहां विस्फोटक अवशेषों, बीमारी और व्यापक विस्थापन के बीच जीवन स्थितियों को “भयावह” बताया।
दोनों मोर्चों पर संयुक्त राष्ट्र की चिंता अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के पालन और नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा पर केंद्रित रही। सुरक्षा परिषद के पांच यूरोपीय सदस्यों—फ्रांस, ब्रिटेन, ग्रीस, लातविया और डेनमार्क—ने पश्चिमी तट की बिगड़ती स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए बस्ती विस्तार की कड़ी निंदा की। अफगान-पाक मामले में यूनामा और यूनिसेफ ने सभी पक्षों से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा है। फिलहाल, दोनों ही संघर्षों में कूटनीतिक समाधान के ठोस संकेत नहीं दिख रहे हैं; अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बीच पिछले अक्टूबर का युद्धविराम ध्वस्त हो चुका है, जबकि पश्चिमी तट पर बस्ती विस्तार और हिंसा जारी है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में फिलिस्तीनी स्थिति पर चर्चा अपेक्षित है, और अफगानिस्तान में मानवीय सहायता अभियान का विस्तार किया जा रहा है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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संयुक्त राष्ट्र ने दोहरी अपील जारी की, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया कमज़ोर बनी हुई है: वह इज़राइली बस्तियों की मौखिक निंदा करता है, लेकिन उत्पीड़ित फ़िलिस्तीनी जनता के ख़िलाफ़ कब्ज़ाधारियों की आक्रामकता की निंदा करने का साहस नहीं जुटा पाता। अफ़ग़ान-पाकिस्तानी मोर्चे पर, पाकिस्तानी हवाई हमलों में दर्जनों नागरिक मारे गए, फिर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुप है। ईरानी कथा मुस्लिम पीड़ा और पश्चिमी पाखंड को उजागर करती है।
मास्को अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सशस्त्र संघर्ष पर चिंता व्यक्त करता है और पक्षों से शत्रुता रोकने और बातचीत शुरू करने का आग्रह करता है। रूसी कूटनीति इज़राइली बस्तियों के मुद्दे को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर देती है और केवल अपने दक्षिणी पड़ोस को स्थिर करने पर ध्यान केंद्रित करती है। यह अपील व्यावहारिक है, जिसका उद्देश्य काबुल और इस्लामाबाद को बातचीत की मेज पर वापस लाना है।
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