
जब डरबन का ड्राइव-इन बना विस्थापन का शिविर, और अफ्रीकी एकता के सपने बिखरे
दक्षिण अफ्रीका में 30 जून की विदेशी-विरोधी रैलियों से पहले हजारों प्रवासी बसों की कतार में खड़े हैं, जबकि उपनिवेशवादी सीमाओं और आर्थिक विफलताओं ने पड़ोसियों को पराया बना दिया है।
डरबन के पुराने ड्राइव-इन सिनेमा की जगह अब एक अस्थायी शिविर ने ले ली है। सफेद तिरपालों से बने ये टेंट दूर से देखने पर उस स्टेडियम की छत की याद दिलाते हैं, जिसे 2010 के फीफा विश्व कप के लिए बनाया गया था—वही विश्व कप जब दक्षिण अफ्रीका ने अपनी गर्मजोशी भरी मेज़बानी से दुनिया का दिल जीता था। लेकिन अंदर का नज़ारा बिल्कुल अलग है। मुख्य टेंट में सूरज की रोशनी मुश्किल से पहुँचती है। जब आँखें अँधेरे की आदी होती हैं, तब फर्श पर सूटकेस और कपड़ों के बंडलों के बीच सोते हुए लोग दिखाई देते हैं। बीच में सैकड़ों मलावी पुरुषों की एक खामोश कतार है, जो धीरे-धीरे आगे खिसक रही है। दूर से एक आगंतुक ने जैसे ही तस्वीर खींचनी चाही, तुरंत असंतोष फूट पड़ा—यहाँ हर चेहरे पर डर और बेचैनी साफ झलकती है।
यह दृश्य 30 जून की उस तारीख की दहलीज पर है, जिसे ‘मार्च एंड मार्च’ जैसे नागरिक समूहों ने सभी अवैध प्रवासियों के लिए देश छोड़ने की अंतिम समय-सीमा घोषित कर रखी है। डरबन के इस शिविर में ही नहीं, केपटाउन में जिम्बाब्वे के वाणिज्य दूतावास के बाहर फुटपाथ पर सैकड़ों लोग बसों की प्रतीक्षा में सो रहे हैं। 37 वर्षीय इब्राहिम मूसा अपनी पत्नी के साथ उस लंबी कतार में खड़े हैं, जिसमें कई महिलाएँ शिशुओं को पीठ पर बाँधे हुए हैं। वे कहते हैं, “हम डरे हुए हैं क्योंकि पता नहीं लोग क्या करने वाले हैं।” मोजाम्बिक के एंटोनियो न्जीवे का घर जला दिया गया, वे बिना कपड़ों के भागे। अब तक 15,000 से अधिक मलावी नागरिकों को स्वदेश भेजने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, और हजारों अब भी कैंपों में दस्तावेजों की जाँच का इंतजार कर रहे हैं।
यह संकट महज कानूनी हैसियत का नहीं, बल्कि अफ्रीका की उस बँटी हुई पहचान का है, जो औपनिवेशिक सीमाओं की देन है। घाना के व्यवसायी सीदू अगोंगो लिखते हैं कि ये सीमाएँ कभी हमारी अपनी नहीं थीं, इन्हें प्रशासनिक और दोहन के हित में खींचा गया था। आज उन्हीं कृत्रिम रेखाओं के आधार पर पड़ोसी को बाहरी ठहराया जा रहा है। एमटीएन समूह के अध्यक्ष मसेबिसी जोनास ने एक शोक सभा में कहा कि “विदेशी कल चले जाएँगे—असमानता हमारे साथ रहेगी।” उन्होंने राज्य की विफलता और जनजातीय पहचान की राजनीति को इस ज़हर की जड़ बताया, जो मुक्ति आंदोलनों तक में पनप रही है।
यह तस्वीर सिर्फ दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई हिस्सों में, जिनमें दक्षिण एशिया भी शामिल है, आर्थिक दबाव और कमजोर शासन प्रवासियों को बलि का बकरा बनाने की प्रवृत्ति को जन्म देते हैं। डरबन की दीवारों पर चिपके पर्चे—“जाने का समय”—और घर-घर जाकर विदेशियों को सामान बाँधने का आदेश देने वाले समूह, एक ऐसे समाज की ओर इशारा करते हैं जो अपनी ही विफलताओं का ठीकरा कमजोर वर्ग पर फोड़ रहा है। कांगो से आई शरणार्थी लीन सेफू, जो तीन साल की उम्र में दक्षिण अफ्रीका आई थीं, गृह मंत्रालय के बाहर फुटपाथ पर बैठी हैं। वे कहती हैं, “वापस जाना मौत की तरफ लौटने जैसा है।”
ड्राइव-इन शिविर के बाहर बिखरे सामान के बीच, जूतों, कपड़ों, गत्ते की प्लेटों और डायपरों के ढेर में किसी ने अपने निवास परमिट की एक प्रति खो दी—या फेंक दी। वह दस्तावेज, जो कभी एक नई शुरुआत का वादा था, अब धूल में पड़ा है। और भीतर, अँधेरे टेंट में, खामोश कतार रेंगती रहती है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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30 जून के अल्टीमेटम ने एक मानवीय संकट खड़ा कर दिया है, जिसमें हज़ारों अफ़्रीकी प्रवासी डर के मारे दक्षिण अफ़्रीका छोड़ रहे हैं। यह विदेशी-विरोधी अभियान अफ़्रीकी एकता को धोखा देता है और इस बात को नज़रअंदाज़ करता है कि दक्षिण अफ़्रीका की समृद्धि बाकी अफ़्रीका पर टिकी है। वापसी के लिए कतार में लगे मलावीवासी और फुटपाथों पर सोते ज़िम्बाब्वेवासी एक शर्मनाक अध्याय हैं।
डरबन में एक विदेशी-विरोधी आंदोलन ने अवैध विदेशियों के लिए एक समय-सीमा तय कर दी है, जिससे दहशत और बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है। उमलाज़ी की पहाड़ी पर माहौल तनावपूर्ण है, प्रदर्शनकारी पारंपरिक वेशभूषा और राष्ट्रीय झंडों के साथ हैं, जबकि हज़ारों लोग देश छोड़ने का रास्ता ढूंढ रहे हैं।
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