
युद्धविराम की घोषणा के साये में ईरान का विश्व कप आगाज़, तनाव और प्रवासी विरोध के बीच मैदान पर उतरी टीम
अमेरिका के साथ चार महीने के युद्ध के बाद घोषित शांति समझौते और लॉस एंजेलिस की सड़कों पर ईरानी प्रवासियों के प्रदर्शन के बीच टीम मेली ने न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ अपने विश्व कप अभियान की शुरुआत की।
सोमवार रात लॉस एंजेलिस के सोफ़ी स्टेडियम में जब ईरानी फ़ुटबॉल टीम न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ मैदान में उतरी, तो यह महज़ एक खेल प्रतियोगिता की शुरुआत नहीं थी। इससे ठीक एक दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तेहरान ने पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक शांति समझौते की घोषणा की, जिसने फ़रवरी से जारी सैन्य संघर्ष पर विराम लगा दिया। होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने और नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की सहमति के साथ ही ईरानी खिलाड़ी तिजुआना (मेक्सिको) से एक छोटी उड़ान भरकर अमेरिकी धरती पर उतरे, जहाँ उन्हें चार घंटे की कड़ी सुरक्षा जाँच से गुज़रना पड़ा। यह पहला मौक़ा है जब किसी विश्व कप मेज़बान देश ने किसी भागीदार राष्ट्र के साथ युद्ध के दौरान उसकी टीम की मेज़बानी की हो।
ईरान की इस ऐतिहासिक भागीदारी की राह आसान नहीं थी। पिछले चार महीनों से अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हवाई हमलों के बादल के नीचे टीम को अपना प्रशिक्षण शिविर एरिज़ोना से हटाकर मेक्सिको के तिजुआना में स्थानांतरित करना पड़ा। वीज़ा संबंधी अड़चनों ने कई अधिकारियों और यहाँ तक कि सोमालिया के रेफ़री उमर आर्तान को भी अमेरिका में प्रवेश से वंचित कर दिया। ईरानी कप्तान मेहदी तारेमी ने मैच से पहले खुलकर कहा कि “इस तरह का तनाव विश्व कप की ख़ुशी को कमज़ोर करता है” और फ़ीफ़ा के शांति संदेश के विपरीत है। कोच अमीर ग़लेनोई ने भावुक लहज़े में कहा कि टीम ईरान के अंदर और बाहर रहने वाले सभी ईरानियों के लिए ख़ुशी और एकता लाना चाहती है।
लॉस एंजेलिस, जिसे यहाँ की विशाल ईरानी प्रवासी आबादी के कारण ‘तेहरान एंजेलिस’ कहा जाता है, इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र बिंदु बना रहा। स्टेडियम के बाहर पुलिस घेरे के पार करीब पचास प्रदर्शनकारियों ने 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले के शेर-और-सूरज वाले झंडे लहराए और मेगाफ़ोन के ज़रिए तेहरान शासन के ख़िलाफ़ नारे लगाए। ये प्रदर्शनकारी जनवरी में ईरान के अंदर हुए राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों और उसके बाद हुई ख़ूनी कार्रवाई से भी आक्रोशित थे। फ़ीफ़ा ने ऐसे झंडों पर प्रतिबंध लगा दिया, जबकि ईरानी शासन ने चेतावनी दी कि अगर अनधिकृत झंडे दिखे या टीम के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी हुई तो वह मैच रुकवा सकता है।
वैश्विक नज़रिए से देखें तो यह मुक़ाबला खेल और कूटनीति के बीच की पतली लकीर को उजागर करता है। दक्षिण एशिया के लिए इसके मायने विशेष हैं: पाकिस्तान की मध्यस्थता ने उसे एक बार फिर क्षेत्रीय शांति-निर्माता के रूप में स्थापित किया, जबकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य का खुलना भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातकों के लिए तेल आपूर्ति की स्थिरता सुनिश्चित करता है। यूरोपीय और लातिन अमेरिकी मीडिया ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मेक्सिको ने ईरानी टीम को शरण देकर एक तरह की मानवीय और खेल कूटनीति निभाई।
आगे की राह अब भी चुनौतियों से भरी है। ईरान ने अब तक सात विश्व कप में कभी ग्रुप चरण पार नहीं किया है, और बेल्जियम व मिस्र जैसी टीमों के साथ ग्रुप जी में उसकी राह कठिन है। न्यूज़ीलैंड भी 2010 के बाद पहली बार विश्व कप में लौटा है और अपनी पहली जीत की तलाश में है। लेकिन इस मैच का असली परिणाम स्कोरलाइन से कहीं आगे जाएगा—यह तय करेगा कि क्या फ़ुटबॉल सचमुच युद्ध और राजनीति के घावों पर मरहम लगा सकता है, या फिर तनाव की यह आग पूरे टूर्नामेंट को अपनी चपेट में ले लेगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरान की राष्ट्रीय टीम एक महान और गर्वित राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हुए अमेरिका पहुंची है, जिसका एकमात्र ध्यान फुटबॉल के माध्यम से खुशी और सांस्कृतिक एकता लाना है। कोच ने ईरान का प्रतिनिधित्व करने पर प्रसन्नता व्यक्त की, और मैच को एक खेल आयोजन के रूप में देखा जा रहा है जो राजनीतिक तनावों से परे है, विशेषकर शांति समझौते के बाद।
ईरानी-अमेरिकी प्रवासी समूह स्टेडियम के बाहर विरोध प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं, क्रांति-पूर्व झंडे लहरा रहे हैं और तेहरान शासन के हिंसक दमन की निंदा कर रहे हैं। टीम की भागीदारी को लेकर समुदाय गहराई से विभाजित है, कई लोग इसे दमनकारी सरकार के प्रतीक के रूप में देखते हैं, न कि खेल उत्सव के रूप में।
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