
विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस पर जलवायु जोखिमों से बच्चों और बुजुर्गों की दोहरी चुनौती उजागर
15 जून को जारी दो प्रमुख अध्ययनों ने दिखाया कि जलवायु परिवर्तन और दुर्व्यवहार बच्चों व बुजुर्गों को एक साथ असम्मानजनक रूप से प्रभावित कर रहे हैं, भारत और ब्राज़ील के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति विशेष चिंताजनक है।
15 जून को विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस के अवसर पर दो वैश्विक रिपोर्टों ने समाज के सबसे कमज़ोर वर्गों—बच्चों और बुज़ुर्गों—के सामने खड़ी होती दोहरी चुनौती को रेखांकित किया। एक ओर यूनिसेफ़ ने ‘रिस्क क्लाइमेटिको दास क्रियांकास 2026’ जारी कर चेताया कि दुनिया के लगभग आधे बच्चे, यानी 1.1 अरब, कम से कम तीन जलवायु आपदाओं की चपेट में हैं। दूसरी ओर हेल्पएज इंडिया ने भारत के ग्रामीण बुज़ुर्गों पर जलवायु जोखिमों का पहला व्यापक अध्ययन प्रस्तुत किया, जिसमें 78 प्रतिशत वृद्धों ने पिछले तीन वर्षों में कम से कम एक जलवायु आपदा झेलने की बात कही। इन आँकड़ों के समानांतर ब्राज़ील में ‘जून्हो वायोलेटा’ अभियान के तहत वृद्धों के विरुद्ध हिंसा के बढ़ते मामलों पर प्रकाश डाला गया, जहाँ 2026 के पहले चार महीनों में ही लगभग ढाई लाख शिकायतें दर्ज हुईं।
यूनिसेफ़ की रिपोर्ट ने बताया कि बच्चों का शरीर वयस्कों की तुलना में तेज़ी से गर्म होता है, पसीना कम निकलता है और साँस तेज़ चलती है, जिससे लू, सूखा और बाढ़ जैसे ख़तरे उनके लिए कहीं अधिक घातक बन जाते हैं। वैश्विक स्तर पर 40 लाख से अधिक बच्चे एक साथ छह प्रकार के जलवायु संकटों का सामना कर रहे हैं। ब्राज़ील में हर दस में से तीन बच्चे—क़रीब 1.6 करोड़—तीन या अधिक ख़तरों से घिरे हैं, जबकि छह में से एक से अधिक ख़तरे की चपेट में कुल 3 करोड़ नाबालिग हैं। रिपोर्ट में इस वर्ष संभावित तीव्र अल नीनो को देखते हुए सरकारों से तत्काल बाल संरक्षण रणनीतियाँ बनाने का आग्रह किया गया।
भारत के ग्रामीण इलाकों में स्थिति भिन्न नहीं है। हेल्पएज इंडिया ने दस राज्यों के 2,224 बुज़ुर्गों के सर्वेक्षण में पाया कि 45 प्रतिशत ने लू, 27 प्रतिशत ने बाढ़ और 20 प्रतिशत ने सूखे का सामना किया, और कई बुज़ुर्ग बार-बार आपदाओं से जूझ रहे थे। कच्चे या बिना हवादार मकानों में रहने वाले लगभग 60 प्रतिशत वृद्धों के लिए गर्मी का तनाव सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा। अध्ययन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जलवायु अनुकूलन की नीतियों में बुज़ुर्गों की देखभाल, गरिमा और स्वायत्तता को केंद्र में रखना अब नीतिगत अनिवार्यता है।
दुर्व्यवहार के आयाम भी कम गंभीर नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र की पहल पर शुरू हुए इस दिवस का उद्देश्य शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, वित्तीय और यौन शोषण के साथ-साथ उपेक्षा और परित्याग जैसे मूक अपराधों को दृश्यता देना है। ब्राज़ील के मानवाधिकार मंत्रालय के अनुसार जनवरी 2024 से अप्रैल 2026 के बीच ‘डिस्क 100’ हेल्पलाइन पर 16 लाख से अधिक शिकायतें दर्ज की गईं, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 19 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती हैं। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि भय और सामाजिक दबाव के कारण अधिकांश पीड़ित रिपोर्ट नहीं करते, इसलिए वास्तविक संख्या कहीं अधिक हो सकती है।
ये आँकड़े एक साझा सच्चाई की ओर इशारा करते हैं: जलवायु आपदाएँ और सामाजिक उपेक्षा अक्सर एक-दूसरे को गहराती हैं। ग्रामीण भारत में कच्चे मकानों में रहने वाला बुज़ुर्ग और ब्राज़ील के शहरी किनारे पर बसा बच्चा, दोनों ही ऐसे संकटों का सामना कर रहे हैं जहाँ संस्थागत सहारा कमज़ोर है। आगे की राह में जलवायु अनुकूलन को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ना, आपदा पूर्व चेतावनी प्रणालियों में वृद्धों और बच्चों की विशेष ज़रूरतों को शामिल करना, और दुर्व्यवहार की शिकायतों को प्रोत्साहित करने वाले भरोसेमंद तंत्र बनाना अनिवार्य होगा। दक्षिण एशिया और लातीनी अमेरिका जैसे क्षेत्रों, जहाँ जनसांख्यिकीय बदलाव और जलवायु संवेदनशीलता एक साथ मौजूद हैं, के लिए यह दोहरा एजेंडा नीति-निर्माण की अगली बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में 1.1 अरब बच्चे कम से कम तीन जलवायु खतरों का सामना कर रहे हैं। ब्राजील में, 1.6 करोड़ बच्चे गर्मी की लहरों, सूखे और तूफानों से प्रभावित हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन खतरे में है।
यूनिसेफ ने चेतावनी दी है कि लगभग सभी बच्चे जलवायु खतरों के संपर्क में हैं, जिनमें 1.8 अरब सूखे और 1.2 अरब अत्यधिक गर्मी का सामना कर रहे हैं। बच्चे असम्मानजनक रूप से प्रभावित हैं, और सरकारों को तत्काल बुनियादी ढांचे, अनुकूलन और आपदा प्रबंधन में निवेश करना चाहिए।
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