
रॉबिन हुड का प्रसिद्ध 'मेजर ओक' वृक्ष 1200 वर्षों बाद मृत, पर्यटकों का प्रेम बना काल
शेरवुड वन का 1200 वर्ष पुराना 'मेजर ओक' इस वसंत पत्तियाँ नहीं उगा सका, आरएसपीबी ने मृत्यु की पुष्टि की; सदियों के पर्यटन दबाव और जलवायु परिवर्तन को कारण माना गया।
इंग्लैंड के नॉटिंघमशायर स्थित शेरवुड वन में 1200 वर्षों से खड़ा विशाल 'मेजर ओक' वृक्ष इस वसंत में पत्तियाँ उगाने में विफल रहा, जिसके बाद रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स (आरएसपीबी) ने गुरुवार को इसकी मृत्यु की पुष्टि कर दी। रॉबिन हुड की किंवदंती से जुड़ा यह बलूत का पेड़, जिसके बारे में माना जाता है कि इसने मध्यकालीन डाकू और उसके साथियों को नॉटिंघम के शेरिफ से बचने के लिए शरण दी थी, अब केवल एक स्मारक के रूप में खड़ा रहेगा। आरएसपीबी ने इसे 'सभी के लिए हृदयविदारक' बताया, जबकि स्थानीय प्रकृति शिक्षक रॉबर्ट ब्रैकली ने कहा कि यह क्षण दुखद है परंतु किंवदंती सदा जीवित रहेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस ऐतिहासिक वृक्ष की मृत्यु के पीछे कई कारक हैं। पिछली दो शताब्दियों से लाखों पर्यटकों के आने से इसके चारों ओर की मिट्टी इतनी संकुचित हो गई कि वर्षा का पानी जड़ों तक नहीं पहुँच पाता था। 1904 से ही इसकी विशाल शाखाओं को धातु की जंजीरों और लकड़ी के सहारे से थामा गया था, और खोखले हिस्सों को कंक्रीट से भर दिया गया था—ये हस्तक्षेप पेड़ की प्राकृतिक उम्र बढ़ने की प्रक्रिया में बाधा बने। इसके अतिरिक्त, हाल के वर्षों में पड़ी भीषण गर्मी और सूखे की लहरों, तथा जलवायु परिवर्तन ने भी स्थिति को गंभीर बना दिया। 1970 के दशक में पेड़ के चारों ओर बाड़ लगा दी गई थी, लेकिन तब तक क्षति हो चुकी थी। स्वीडिश, जर्मन और रूसी मीडिया ने भी इस घटना को प्रमुखता से उठाया, और इसे 'प्यार से मारा गया पेड़' करार दिया।
यह समाचार केवल ब्रिटेन तक सीमित नहीं रहा; ऑस्ट्रेलिया, चीन, अरब जगत और भारत सहित विश्व भर के मीडिया ने इस पर रिपोर्टिंग की, जो इस पेड़ की वैश्विक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को दर्शाता है। रॉबिन हुड की कहानी, जो अमीरों से लूटकर गरीबों में बाँटने वाले एक विद्रोही की है, सीमाओं से परे लोकप्रिय है। अब मेजर ओक मृत लकड़ी के रूप में शेरवुड के हृदय में खड़ा रहेगा, और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण बना रहेगा—कीट, कवक और अन्य जीवों को आवास प्रदान करेगा।
यह घटना वैश्विक स्तर पर संरक्षण की चुनौतियों को रेखांकित करती है। भारत में भी कोलकाता का 250 वर्ष पुराना 'ग्रेट बरगद' या कश्मीर के चिनार वृक्ष जैसे प्राचीन पेड़ पर्यटन दबाव और बदलती जलवायु का सामना कर रहे हैं। मेजर ओक का भाग्य एक चेतावनी है कि ऐतिहासिक प्राकृतिक धरोहरों के प्रति प्रेम यदि असंतुलित हो तो विनाशकारी हो सकता है। आरएसपीबी और स्थानीय विशेषज्ञों का मानना है कि किंवदंती हमेशा जीवित रहेगी, लेकिन हमें भविष्य में ऐसे स्थलों के प्रबंधन में स्थायी पर्यटन और पारिस्थितिक संवेदनशीलता को प्राथमिकता देनी होगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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शेरवुड वन का हजार साल पुराना मेजर ओक, जो रॉबिन हुड की कथा से जुड़ा है, इस वसंत में पत्ते न निकलने के बाद मर गया। सूखा, भीषण गर्मी और मानवीय दबाव—जिसमें जंजीरों और कंक्रीट से संरक्षण के प्रयास भी शामिल हैं—को कारण माना गया है। मृत तना खड़ा रहेगा, पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अब भी उपयोगी, जबकि किंवदंती जीवित रहेगी।
शेरवुड का ओक पर्यटकों के 'प्रेम से मारा गया', सदियों की मिट्टी की सिकुड़न ने इसे दम तोड़ने पर मजबूर किया। इसी बीच, रॉबिन हुड की कथा को एक अंधेरे, हिंसक रूप में दोबारा पेश किया जा रहा है—एक नई फिल्म लोकनायक को एंटीहीरो बना देती है। पेड़ का अंत रोमांटिक डाकू मिथक के ढलने का प्रतीक है।
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