
चीन का परमाणु पनडुब्बी से दुर्लभ मिसाइल परीक्षण, क्षेत्रीय देशों ने जताई आपत्ति
1982 के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकारे गए इस परीक्षण को बीजिंग ने नियमित अभ्यास बताया, जबकि जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चिंताजनक करार दिया।
चीनी जनवादी मुक्ति सेना (पीएलए) की नौसेना ने 6 जुलाई को एक परमाणु-संचालित रणनीतिक पनडुब्बी से प्रशांत महासागर के अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक रणनीतिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, प्रशिक्षण के लिए बनाए गए डमी वॉरहेड से लैस यह मिसाइल पूर्व-निर्धारित समुद्री क्षेत्र में सटीकता से गिरी। चीनी नौसेना ने इसे वार्षिक सैन्य प्रशिक्षण की एक नियमित प्रक्रिया बताया और कहा कि यह किसी विशेष देश या लक्ष्य के विरुद्ध नहीं था। हांगकांग के साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, यह 1982 के बाद चीन का पहला ज्ञात पनडुब्बी-आधारित मिसाइल परीक्षण है और परमाणु पनडुब्बी से किया गया पहला सार्वजनिक परीक्षण है।
इस परीक्षण पर क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं तीखी रहीं। जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरू किहारा ने कहा कि चीन की सैन्य गतिविधियों में पारदर्शिता की कमी गंभीर चिंता का विषय है, हालांकि मिसाइल जापानी क्षेत्र या विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) के ऊपर से नहीं गुज़री। ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने इसे 'क्षेत्र के लिए अस्थिर करने वाला' बताया और कहा कि यह परीक्षण फिजी के साथ रक्षा संधि पर हस्ताक्षर के कुछ घंटों बाद हुआ, जो चीन के तीव्र सैन्य विस्तार के संदर्भ में और भी चिंताजनक है। न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने दक्षिण प्रशांत परमाणु-मुक्त क्षेत्र में इस परीक्षण पर गहरी चिंता व्यक्त की और इसे क्षेत्रीय स्थिरता के अनुकूल नहीं बताया। पापुआ न्यू गिनी को भी पूर्व सूचना दी गई थी। इसके विपरीत, क्रेमलिन के प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव ने कहा कि चीन को अपनी मिसाइलों के परीक्षण का संप्रभु अधिकार है और इससे किसी को खतरा नहीं है।
यह परीक्षण ऐसे समय में हुआ जब चीन और रूस की नौसेनाओं ने पूर्वी चीन के क़िंगदाओ तट पर अपना वार्षिक संयुक्त अभ्यास शुरू किया, हालांकि दोनों घटनाओं के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं किया गया है। ताइवान के राष्ट्रीय सुरक्षा कार्यालय ने बताया कि चीनी नौसेना ने पहली द्वीप शृंखला के आसपास 110 से अधिक युद्धपोत तैनात किए हैं, जो जुलाई-सितंबर के चरम अभ्यास काल में सामान्य से अधिक है। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह परीक्षण चीन की समुद्र-आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के विस्तार को दर्शाता है, विशेषकर जेएल-3 जैसी मिसाइलों के साथ जो चीनी तट के पास से अमेरिकी मुख्यभूमि तक मार करने में सक्षम मानी जाती हैं।
यह दो वर्षों से भी कम समय में चीन का दूसरा सार्वजनिक रूप से घोषित प्रशांत मिसाइल परीक्षण है; इससे पहले सितंबर 2024 में एक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया गया था। हालांकि बीजिंग ने अपनी 'पहले उपयोग न करने' की परमाणु नीति दोहराई है, लेकिन पारदर्शिता का अभाव क्षेत्रीय आशंकाओं को बढ़ा रहा है। फ़िलहाल किसी और परीक्षण की घोषणा नहीं की गई है, परंतु प्रशांत द्वीपीय देशों और क्षेत्रीय मंचों पर चीन के सैन्य इरादों को लेकर स्पष्टता की मांग जारी रहने की संभावना है।
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.70 | critical |
|---|---|---|
| चीनी प्रेस | +0.80 | aligned |
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.20 | neutral |
The Atlantic bloc denounces the Chinese test as a nuclear provocation threatening Pacific stability, highlighting the timing with the Australia-Fiji defense deal.
It builds credibility by emphasizing the missile's nuclear capability and the immediate geopolitical context, presenting the test as a direct challenge to regional order.
It omits that China notified countries in advance and that the test was a routine annual exercise.
China celebrates the successful launch as a routine test, reiterating that it is not directed against any country and that notifications were sent.
It makes the action plausible by describing it as a scheduled annual exercise, compliant with international law, and downplaying adverse reactions as unfounded.
It omits the protests from Japan, Australia, and New Zealand, as well as concerns about the Pacific nuclear-free zone.
Continental Europe reports the Chinese test with contrasting tones, alternating routine descriptions with concerns about regional stability.
It uses a balanced approach, citing both the Chinese version (routine test, notification) and critical reactions from neighboring countries, without taking a clear stance.
It omits the specific context of the Australia-Fiji deal, which is emphasized by the Atlantic press.
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