
जब संसद में एक मंत्री ने कहा, 'इस साल विस्तार संभव नहीं' — स्कूली भोजन की थाली में उम्मीद और विवशता
घाना की संसद में वित्तीय मंजूरी न मिलने की घोषणा से लेकर नोवा स्कोटिया के हर पब्लिक स्कूल तक पहुँचते सस्ते लंच तक, स्कूली आहार कार्यक्रमों की दुनिया एक ही समय में ठहराव, विस्तार और सख़्ती के कई रंग दिखा रही है।
अकरा की संसद में बुधवार को जब लैंगिक मामलों की मंत्री एग्नेस ना मोमो लार्टे ने सदन को संबोधित किया, तो हवा में एक अजीब-सी दोहरी धुन थी — एक ओर चार लाख से अधिक बच्चों तक रोज़ पहुँचने वाले गर्म भोजन की उपलब्धि का गर्व, दूसरी ओर ‘इस वर्ष कोई नया स्कूल नहीं जुड़ेगा’ कहते हुए आवाज़ में वह थकान जो बजटीय बंदिशों से पैदा होती है। सूत्रों के अनुसार, मंत्री ने साफ़ कहा कि 2026 के विनियोग में स्कूल फीडिंग कार्यक्रम के विस्तार के लिए वित्तीय मंजूरी नहीं दी गई, हालाँकि सरकार की दीर्घकालिक नीति इसी कार्यक्रम को धीरे-धीरे मज़बूत और व्यापक बनाने की है।
यह घोषणा महज़ एक प्रशासनिक अड़चन नहीं थी; इसके ठीक पहले और बाद में उसी मंत्री के दूसरे बयानों ने पूरी तस्वीर को और पेचीदा बना दिया। एक ओर उन्होंने बताया कि कुछ खानपान ठेकेदारों को घटिया भोजन परोसने पर वापस लौटना पड़ा, और लगातार दो-तीन चेतावनियों के बाद अनुबंध रद्द करने तक की कार्रवाई शुरू हो गई है। पूर्वी क्षेत्र की एक हालिया घटना का हवाला देते हुए उन्होंने यह भी कहा कि अब शिक्षकों के सामने सामग्री की जाँच कर भोजन पकाने की व्यवस्था बनाई जा रही है, ताकि पारदर्शिता बढ़े। दूसरी ओर, विदेशी बच्चों को सड़कों से हटाने के अभियान को भी संसाधनों की कमी के कारण स्थगित कर दिया गया है — एक ऐसा क़दम जो बताता है कि सामाजिक हस्तक्षेप की कई परतें एक ही राजकोषीय सीमा से बँधी हैं।
इस पूरे प्रकरण को अगर पश्चिम अफ़्रीकी और वैश्विक संदर्भ में रखें, तो स्कूली भोजन अब महज़ कल्याणकारी योजना नहीं रह गया है, बल्कि मानव पूँजी में एक रणनीतिक निवेश माना जाने लगा है। घाना का यह कार्यक्रम फ़िलहाल 12,000 सरकारी बुनियादी स्कूलों में क़रीब 42 लाख विद्यार्थियों को रोज़ एक गर्म पौष्टिक आहार देता है, और इसका सीधा असर नामांकन, उपस्थिति और स्थानीय कृषि उत्पादन पर पड़ा है। ठीक इसी समय, लागोस में 30 जून को ‘अडॉप्ट अ स्कूल स्नैक्स फ़ॉर थॉट’ पहल का आग़ाज़ होने जा रहा है, जिसके तहत रोज़ाना 30,000 बच्चों को मुफ़्त स्नैक्स और पेय दिए जाएँगे। नाइजीरिया की संघीय सरकार, राज्य सरकार और 57 स्थानीय निकाय मिलकर इसे चला रहे हैं, और कार्यक्रम प्रबंधक डॉ. अदेरेमी अदेबोवाले के शब्दों में, ‘भूख सीखने की सबसे बड़ी बाधा है’ — यह वाक्य अब नीति-निर्माताओं की आम भाषा बन चुका है।
उत्तरी अमेरिका से आती एक अलग तस्वीर इस विमर्श को और चौड़ा करती है। नोवा स्कोटिया में इसी सितंबर से प्रदेश का किफ़ायती स्कूल लंच कार्यक्रम हर पब्लिक स्कूल तक पहुँच जाएगा — 372 स्कूलों में ‘पे-व्हाट-यू-कैन’ मॉडल पर चलने वाली यह योजना अब तक 1.2 करोड़ से अधिक भोजन परोस चुकी है। वहाँ शिक्षा मंत्री ब्रेंडन मग्वायर ने इसे परिवारों की किराने की लागत घटाने वाला क़दम बताया, और मेन्यू में चिकन सीज़र रैप, चिकन फ़्राइड राइस और रामेन-शैली के नूडल बाउल जोड़े जाने की घोषणा की — यह सब विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया के आधार पर तय हुआ। भारत जैसे दक्षिण एशियाई देशों के लिए यह तुलना सोचने का मौक़ा देती है, जहाँ मिड-डे मील योजना करोड़ों बच्चों तक पहुँचती है, लेकिन गुणवत्ता और वित्तीय स्थिरता के सवाल लगातार उठते रहे हैं।
अंततः, घाना की संसद में मंत्री लार्टे का एक और वाक्य इस पूरी कहानी का सबसे मार्मिक स्थिर चित्र बन गया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति जॉन ड्रामानी महामा सामाजिक हस्तक्षेपों का विस्तार चाहते हैं, और लीप कार्यक्रम का दायरा बढ़ भी रहा है, लेकिन ‘इस साल विस्तार की कोई संभावना नहीं है।’ यह एक ऐसा ठहराव है जिसके बीच शिक्षकों की निगरानी में पकते बर्तनों की आवाज़, ठेकेदारों को लौटाए जा रहे भोजन की खट्टी गंध, और लागोस-नोवा स्कोटिया में खुल रही नई रसोइयों की भाप — सब एक साथ सुनाई देती हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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घाना सरकार मानती है कि बजट की सीमाएँ इस वर्ष स्कूल भोजन कार्यक्रम में और स्कूल जोड़ने से रोकती हैं, जबकि यह प्रतिदिन 40 लाख विद्यार्थियों को भोजन कराती रहती है। अधिकारी घटिया भोजन परोसने वाले खानपानकर्ताओं पर दंड लगाने की भी तैयारी कर रहे हैं, और स्कूल उपस्थिति पर कार्यक्रम के सकारात्मक प्रभाव पर जोर दे रहे हैं।
घाना का स्कूल भोजन कार्यक्रम वित्तीय संकट में है, जिससे हज़ारों बच्चे वादा किए गए गर्म भोजन से वंचित रह जाते हैं और कुपोषण तथा स्कूल छोड़ने की आशंकाएँ बढ़ जाती हैं। आलोचक कुप्रबंधन और अनिश्चित बजट आवंटन पर निर्भरता की ओर इशारा करते हुए तत्काल अंतरराष्ट्रीय सहायता और प्रणालीगत सुधार की माँग करते हैं।
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