
रूस ने 39 हजार आर्मीनियाई गुलाब नष्ट किए, पुतिन-पशिनियन वार्ता में जनमत संग्रह पर जोर
व्यापार प्रतिबंधों के बीच पुतिन ने आर्मीनिया से यूरोपीय संघ या यूरेशियाई संघ के चुनाव पर शीघ्र जनमत संग्रह की मांग की, पशिनियन ने प्रतिबंध हटाने का आग्रह किया।
रूस के स्मोलेंस्क क्षेत्र में 39,200 आर्मीनियाई गुलाबों को नष्ट किए जाने के कुछ दिनों बाद राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिनियन के बीच दूरभाष वार्ता हुई। रोसेलखोज़नादज़ोर के अनुसार, ये गुलाब बेलारूस से नकली दस्तावेज़ों के साथ मास्को ले जाए जा रहे थे और मई 2026 से लागू आर्मीनियाई फूलों के आयात प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहे थे। यह घटना उस व्यापक प्रतिबंध श्रृंखला का हिस्सा है जिसके तहत रूस ने आर्मीनिया से टमाटर, खीरा, स्ट्रॉबेरी, डेयरी उत्पाद, शराब और मिनरल वाटर सहित लगभग 130 कृषि वस्तुओं का आयात रोक दिया है।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव ने बताया कि पुतिन ने पशिनियन से यूरोपीय संघ (ईयू) की सदस्यता या यूरेशियाई आर्थिक संघ (ईएईयू) में बने रहने के प्रश्न पर “यथाशीघ्र” राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह कराने की आवश्यकता पर बल दिया। मॉस्को का मानना है कि दोनों संगठनों में एक साथ रहना असंभव है और यह जनमत संग्रह आर्मीनियाई जनता को अंतिम निर्णय लेने का अवसर देगा। वहीं, आर्मीनियाई सरकार के बयान के अनुसार, पशिनियन ने स्पष्ट किया कि ईयू सदस्यता पर जनमत संग्रह तभी संभव है जब येरेवन पहले आधिकारिक आवेदन प्रस्तुत करे और मामला ठोस रूप ले।
पशिनियन ने इसी बातचीत में रूसी बाज़ार में आर्मीनियाई मूल के सामान के निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को द्विपक्षीय संधियों और ईएईयू नियमों का उल्लंघन बताते हुए पुतिन से “इन समस्याओं के समाधान के लिए कदम उठाने” का अनुरोध किया। आर्मीनियाई पक्ष इन प्रतिबंधों को राजनीति से प्रेरित मानता है, जबकि रूसी अधिकारी इन्हें पादप-स्वच्छता सुरक्षा और क्वारंटाइन जोखिमों से जोड़ते हैं। आर्मीनिया के केंद्रीय बैंक ने चेतावनी दी है कि इन पाबंदियों से देश की जीडीपी में 2 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है, क्योंकि रूस उसके कृषि उत्पादों का प्रमुख बाज़ार है।
यह गतिरोध आर्मीनिया के पश्चिमोन्मुख रुख के संदर्भ में गहराया है। 2024 में यूरोपीय संसद ने आर्मीनिया को उम्मीदवार देश का दर्जा देने की संभावना वाला प्रस्ताव पारित किया, और अप्रैल 2025 में आर्मीनियाई राष्ट्रपति ने ईयू में शामिल होने की मंशा वाले कानून पर हस्ताक्षर किए, हालांकि अभी तक कोई औपचारिक आवेदन नहीं हुआ है। मॉस्को इसे ईएईयू से संभावित निकासी की तैयारी के रूप में देखता है और पहले ही आगाह कर चुका है कि ऐसी स्थिति में आर्थिक सहयोग समेटना पड़ सकता है, जिसका असर रूस में काम कर रहे आर्मीनियाई नागरिकों पर भी पड़ेगा। मई 2026 में अस्ताना में हुए ईएईयू शिखर सम्मेलन में रूस, बेलारूस, कज़ाकिस्तान और किर्गिस्तान ने संयुक्त वक्तव्य में आर्मीनिया में जनमत संग्रह की ज़रूरत को रेखांकित किया था।
दक्षिण काकेशस में यह घटनाक्रम भारत की क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं, विशेषकर अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) के लिए भी प्रासंगिक है, जिसमें आर्मीनिया एक संभावित कड़ी है। फिलहाल, पशिनियन ने खुले और मैत्रीपूर्ण संवाद के ज़रिए मुद्दों को सुलझाने की इच्छा जताई है, लेकिन जनमत संग्रह की समय-सीमा आर्मीनिया के औपचारिक ईयू आवेदन पर निर्भर करेगी। रूसी पक्ष ने प्रतिबंधों पर कोई रियायत का संकेत नहीं दिया है, जिससे आने वाले सप्ताहों में द्विपक्षीय आर्थिक तनाव बने रहने की संभावना है।
| रूसी और सीआईएस प्रेस | −0.30 | critical |
|---|---|---|
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | 0.00 | neutral |
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | 0.00 | neutral |
Russia enforces its trade rules and demands Armenia choose between Eurasian and European integration, presenting its position as a defense of legality and sovereignty.
The Russian narrative links the destruction of roses to the need for a referendum, creating a causal link between trade violations and geopolitical choice, thereby justifying pressure on Yerevan.
Russian sources omit that the trade restrictions may be retaliation for Armenia's European ambitions, nor do they report Armenian objections to their legitimacy.
The Arab world observes the dispute between Russia and Armenia with detachment, highlighting Yerevan's strategic realignment toward the West and Moscow's reaction.
The narrative merely describes the facts without taking sides, using a neutral tone that lets the reader draw their own conclusions.
The Arab article does not mention the destruction of roses or trade restrictions, focusing solely on the referendum demand and geopolitical realignment.
Continental Europe reports the phone call balancing Pashinyan's requests on trade restrictions and Putin's insistence on a referendum, without taking sides.
The narrative presents both perspectives as legitimate, using factual language that avoids assigning blame, and highlights divergences without judging them.
European sources do not report the destruction of roses episode, which could have illustrated the trade tension more concretely.
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