
अमेरिका ने इज़राइल को ईरान समझौते का मसौदा दिखाने से इनकार किया, लीक की आशंका बनी वजह
वाशिंगटन ने तेल अवीव के अनुरोध को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि नेतन्याहू दस्तावेज़ सार्वजनिक कर सकते हैं, जबकि पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली इस डील में तेल प्रतिबंधों में ढील दी जाएगी।
अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में तैयार हुए अंतरिम शांति समझौते ने वाशिंगटन और उसके सबसे करीबी क्षेत्रीय सहयोगी इज़राइल के बीच दुर्लभ कूटनीतिक तनाव को उजागर कर दिया है। इज़राइली मीडिया और सूत्रों के अनुसार, तेल अवीव ने जिनेवा में औपचारिक हस्ताक्षर से पहले समझौता ज्ञापन का मसौदा देखने का अनुरोध किया था, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इसे सार्वजनिक कर सकते हैं। i24 न्यूज़ और जेरूसलम पोस्ट की रिपोर्टों के बाद व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने इस दावे को "गलत" बताया और ज़ोर देकर कहा कि पूरी वार्ता के दौरान इज़राइल सहित क्षेत्रीय भागीदारों के साथ निकट समन्वय बनाए रखा गया।
इज़राइली कूटनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम को 'असाधारण और बेहद असामान्य' करार दिया गया है, खासकर तब जब यह मामला दोनों देशों की साझा राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकताओं से जुड़ा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह खटास लेबनान में युद्धविराम और ईरान के प्रति नीतिगत मतभेदों के बाद नेतन्याहू और ट्रंप के बीच बढ़ती दूरी का प्रतिबिंब है। हाल ही में नेतन्याहू ने एक संवाददाता सम्मेलन में इस समझौते पर बमुश्किल चर्चा की, जिससे तेल अवीव की नाराज़गी और अधिक स्पष्ट हो गई।
पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुए इस समझौते के तहत ईरान पर लगे तेल निर्यात प्रतिबंधों को तत्काल हटाने का प्रावधान है, साथ ही बैंकिंग और बीमा सेवाओं पर लगी पाबंदियों में भी ढील दी जाएगी। यह रियायत अमेरिका की ओर से एक बड़ा कूटनीतिक कदम मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य अप्रैल में शुरू हुए नाज़ुक युद्धविराम को अगले 60 दिनों के लिए बढ़ाना और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलना है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेम्स डेविड वेंस ने कहा कि समझौते का पूरा पाठ अरब और मुस्लिम जगत की संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए उचित प्रक्रिया के तहत जल्द ही सार्वजनिक किया जाएगा।
दक्षिण एशियाई परिप्रेक्ष्य से यह घटनाक्रम कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका ने उसे पश्चिम एशिया की कूटनीति में अप्रत्याशित रूप से केंद्र में ला खड़ा किया है, जो भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय हो सकता है। वहीं, ईरानी तेल की वैश्विक बाज़ार में वापसी से कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बन सकता है, जिसका सीधा लाभ भारत जैसे बड़े आयातक को मिलेगा। हालांकि, इस्लामाबाद की बढ़ी हुई कूटनीतिक पहुंच भारत के लिए चुनौती पेश कर सकती है, खासकर तब जब वह अफ़गानिस्तान और मध्य एशिया में अपनी स्थिति मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है।
आगे की राह अनिश्चितताओं से भरी है। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम लगभग प्रतिदिन बैठक कर समझौते के विवरण को अंतिम रूप दे रही है, लेकिन इज़राइल का विरोध और खाड़ी देशों की आशंकाएं इस प्रक्रिया को जटिल बना सकती हैं। यदि समझौता टिकता है, तो यह पश्चिम एशिया में एक नए शक्ति संतुलन की शुरुआत हो सकती है, जिसमें ईरान आर्थिक रूप से मज़बूत होकर लौटेगा। लेकिन अगर नेतन्याहू इसे पटरी से उतारने में सफल रहे, तो क्षेत्रीय तनाव और गहरा सकता है। फिलहाल, सारी निगाहें जिनेवा में होने वाले औपचारिक हस्ताक्षर समारोह पर टिकी हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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The Zionist regime asked to see the text of the agreement with Iran, but Washington refused, leaving Tel Aviv in the dark. This shows American distrust of its ally and the strength of Iran's position.
Israeli sources report that the US refused to share the draft agreement with Iran, fearing Netanyahu might leak it. Washington says it coordinated closely with regional partners, but the move raises questions about transparency.
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