
पृथ्वी का गुरुत्वीय चित्र, सक्रिय शुक्र और आयो का ताप: नई खोजों ने बदली ग्रहीय समझ
नासा के नए गुरुत्व मॉडल ने पृथ्वी की अनियमित आकृति उजागर की, वहीं शुक्र और बृहस्पति के चंद्रमाओं पर भी अप्रत्याशित सक्रियता मिली।
नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के संयुक्त मॉडल GOCO06s ने पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का अब तक का सबसे सटीक त्रिआयामी मानचित्र प्रस्तुत किया। 15 वर्षों में 19 उपग्रहों से एकत्रित 1 अरब से अधिक मापों के आधार पर बने इस जियोइड में लाल रंग अधिक गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्रों (जैसे एंडीज़, हिमालय) और नीला रंग कम घनत्व वालों (हिंद महासागर) को दर्शाता है। वैज्ञानिक माइकल वॉटकिंस के अनुसार, गहराई में पदार्थों के असमान वितरण के कारण ये “पहाड़ियाँ और घाटियाँ” बनती हैं। वास्तव में अंतर इतने सूक्ष्म हैं कि उन्हें दृश्य बनाने के लिए ऊर्ध्वाधर पैमाना 7,000 से 10,000 गुना बढ़ाया गया। इस मॉडल का उपयोग जल चक्र, भूजल भंडार और समुद्र-स्तर वृद्धि की निगरानी में होता है।
इसी तरह, भूकंपीय तरंगों के विश्लेषण ने पृथ्वी के सबसे बड़े ज्ञात ज्वालामुखी विस्फोट के प्रभाव उजागर किए हैं। प्रशांत महासागर में ओंटोंग जावा पठार का निर्माण 12 करोड़ वर्ष पहले हुआ, जब भारी मात्रा में लावा निकला। शोधकर्ताओं ने उच्च-आवृत्ति तरंगों Po और So की गति में कमी पाई, जो संकेत देती है कि मैग्मा ने न केवल सतह बल्कि अंतर्निहित समुद्री प्लेट की रासायनिक संरचना भी बदल दी। अंदर मैग्मा से भरी ऊर्ध्वाधर दरारें (डाइक्स) मिलीं, जो उस प्राचीन उथल-पुथल की गवाह हैं।
शुक्र और बृहस्पति के चंद्रमा आयो पर भी आंतरिक सक्रियता के नए प्रमाण मिले हैं। ईटीएच ज्यूरिख के प्रो. तारास गेर्या के 3डी सिमुलेशन से पता चला कि शुक्र की विशाल भ्रंश घाटियाँ अपेक्षाकृत नई हैं और 3-10 से.मी. प्रति वर्ष की दर से चौड़ी हो रही हैं। यह 1990 के दशक के मैगलन यान की छवियों से मेल खाता है, जो ग्रह की भूवैज्ञानिक निष्क्रियता की धारणा को चुनौती देता है। वहीं, नासा के जूनो यान के माइक्रोवेव रेडियोमीटर ने सतह से 2-6 मीटर नीचे तापमान में 22°C तक की वृद्धि दर्ज की। प्रमुख वैज्ञानिक स्कॉट बोल्टन के अनुसार, बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न ‘टाइडल फ्लेक्सिंग’ द्वारा आयो का आंतरिक भाग लगातार गर्म होता है, और ऊष्मा नीचे से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है।
अंत में, डायनासोरों के विलुप्ति-कारक उल्कापिंड पर भी नई रोशनी पड़ी है। बेल्जियम के प्रो. फिलिप क्लाइस के नेतृत्व में हुए विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि 66 करोड़ वर्ष पूर्व टकराने वाला पिंड अत्यंत दुर्लभ कोरोनेशियन कार्बोनेसियस कॉन्ड्राइट (CO) था, जिसमें गंधक और कार्बन की मात्रा कम थी। इससे संकेत मिलता है कि वायुमंडल में फैले सूक्ष्म कणों ने ठंड बढ़ाई, न कि गंधक ने। इस प्रकार का उल्कापिंड संभवतः बाहरी क्षुद्रग्रह पट्टी या सौरमंडल के सीमांत से आया। आगामी एनविज़न मिशन (2030 के दशक) शुक्र की गहराई जांचेगा, जबकि माइक्रोवेव तकनीक का उपयोग पृथ्वी के ज्वालामुखियों और यूरोपा जैसे बर्फीले चंद्रमाओं पर छिपे महासागरों की खोज में किया जाएगा।
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