
ट्रंप की नाराजगी के बावजूद इज़राइल ने लेबनान पर किए ताजा हमले, ईरान शांति समझौता खतरे में
अमेरिका-ईरान समझौते और ट्रंप की सार्वजनिक फटकार के बावजूद इज़राइल ने दक्षिणी लेबनान में हवाई हमले जारी रखे, जिससे युद्धविराम की उम्मीदों को गहरा झटका लगा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी चेतावनी और ईरान के साथ हुए ऐतिहासिक शांति समझौते के बावजूद इज़राइल ने बुधवार को दक्षिणी लेबनान में नए हवाई हमले किए। लेबनान की राष्ट्रीय समाचार एजेंसी के अनुसार, इज़राइली लड़ाकू विमानों ने नबातियेह अल-फ़ौका क्षेत्र, कफ़र तेबनीत के बाहरी इलाकों और अंसारियेह कस्बे को निशाना बनाया। ये हमले ऐसे समय हुए जब सोमवार को घोषित अमेरिका-ईरान समझौते के तहत हिंसा में कमी की उम्मीद की जा रही थी। हालांकि हमलों की तीव्रता घटी है, फिर भी समझौते के बाद से इज़राइली कार्रवाइयों में अब तक कम से कम पांच लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें मंगलवार को मायफ़दून और शुकीन में वाहनों पर ड्रोन हमले में चार लोग शामिल हैं।
यह सैन्य कार्रवाई ट्रंप की उस सार्वजनिक नाराजगी के ठीक बाद सामने आई, जो उन्होंने फ्रांस के एवियां में जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान व्यक्त की थी। ट्रंप ने इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से लेबनान के प्रति “अधिक जिम्मेदार” होने को कहा और स्पष्ट किया कि वे लेबनान और हिज़्बुल्लाह के साथ इज़राइल के व्यवहार से खुश नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इज़राइल बहुत लंबे समय से लड़ रहा है और बहुत से लोग मारे जा रहे हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान की मध्यस्थता से तैयार हुए इस समझौते का पूरा पाठ जारी नहीं किया गया है, लेकिन मध्यस्थ देश का कहना है कि इसमें लेबनान भी शामिल है। ईरान ने बार-बार चेताया है कि यदि इज़राइली हमले जारी रहे तो वह “कड़ी प्रतिक्रिया” देगा, और हिज़्बुल्लाह ने संकेत दिया है कि जब तक इज़राइल लेबनान में कार्रवाई नहीं रोकता, तेहरान परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा।
जमीनी स्तर पर तनाव लगातार बढ़ रहा है। इज़राइली सेना हदाथा कस्बे की ओर बढ़ रही है और हिज़्बुल्लाह ने कफ़र तेबनीत में दस से अधिक रॉकेट दागे, जिन्हें इज़राइल ने इंटरसेप्ट करने का दावा किया। इज़राइली मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सेना समझौते के बावजूद लेबनान में लंबे समय तक रहने की तैयारी कर रही है। मार्च में शुरू हुई इस लड़ाई में अब तक लगभग चार हज़ार लोग मारे जा चुके हैं और दस लाख से अधिक विस्थापित हुए हैं। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच पैदा हुई यह दरार इसलिए भी अहम है क्योंकि ट्रंप अमेरिका में राजनीतिक दबाव झेल रहे हैं—यह युद्ध वहां अलोकप्रिय है और पेट्रोल की कीमतें बढ़ा चुका है।
दक्षिण एशिया और वैश्विक संदर्भ में देखें तो यह संकट भारत जैसे देशों के लिए दोहरी चिंता पैदा करता है। पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका ने उसे कूटनीतिक लाभ दिया है, जबकि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता पर निर्भरता किसी भी बड़े विस्फोट को संवेदनशील बनाती है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि इज़राइल अपनी सैन्य कार्रवाइयां नहीं रोकता, तो न केवल अमेरिका-ईरान समझौता ध्वस्त हो सकता है, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का खतरा भी पैदा हो सकता है। फिलहाल ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान “अच्छा व्यवहार” नहीं करता, तो अमेरिका फिर से हमले शुरू कर सकता है—ऐसे में शांति की डोर बेहद पतली और कमजोर नजर आ रही है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिका-ईरान समझौते और ट्रंप की आलोचना के बावजूद, इज़राइल दक्षिणी लेबनान पर हमले जारी रखे हुए है, जिसमें नागरिक मारे जा रहे हैं और दस लाख से अधिक विस्थापित हुए हैं। अरब मीडिया मौतों का आंकड़ा उजागर करता है और इज़राइल पर समझौते का उल्लंघन करने तथा नाजुक शांति को खतरे में डालने का आरोप लगाता है।
ट्रंप ने G7 में नेतन्याहू को फटकार लगाई, लेबनान में अधिक जिम्मेदारी की मांग की और ईरान समझौते का प्रचार किया। समझौते के बावजूद इज़राइली हमले जारी हैं, लेकिन विवरण गुप्त हैं। ध्यान राजनयिक तनाव और समझौते के अनिश्चित भविष्य पर है।
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