
डिमेंशिया की रोकथाम: जीवनशैली में बदलाव से 45% मामले टाले जा सकते हैं, नए वैश्विक दिशानिर्देश जारी
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण को भी जोखिम कारकों में शामिल किया, जबकि प्रीक्लिनिकल अध्ययन मस्तिष्क की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को पुनर्प्रोग्राम करने की संभावना दिखा रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 15 जुलाई 2026 को डिमेंशिया के जोखिम को कम करने के लिए अद्यतन दिशानिर्देश जारी किए, जिनमें पहली बार वायु प्रदूषण के संपर्क में कमी और अनुपचारित दृष्टि दोष को रोकथाम योग्य कारकों के रूप में शामिल किया गया है। संगठन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर 5.7 करोड़ से अधिक लोग डिमेंशिया से पीड़ित हैं और हर साल लगभग एक करोड़ नए मामले सामने आते हैं। लैंसेट कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर डब्ल्यूएचओ ने दोहराया कि उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, अत्यधिक शराब सेवन, मोटापा, श्रवण हानि और सामाजिक अलगाव जैसे 13 परिवर्तनीय जोखिम कारकों पर नियंत्रण कर लगभग 45 प्रतिशत मामलों को रोका या विलंबित किया जा सकता है। दिशानिर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया कि विटामिन बी, ई या ओमेगा-3 जैसे पूरक आहार डिमेंशिया की रोकथाम के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं रखते।
रोकथाम की इस रणनीति के समानांतर, मस्तिष्क की आंतरिक कार्यप्रणाली को लक्षित करने वाले नए शोध भी सामने आ रहे हैं। स्पेन के इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज और स्विट्जरलैंड की इकोल पॉलिटेक्निक फेडेरेल डी लॉज़ेन के वैज्ञानिकों ने एक प्रीक्लिनिकल अध्ययन में OLE नामक प्रायोगिक अणु विकसित किया है, जो मस्तिष्क की प्रतिरक्षा कोशिकाओं (माइक्रोग्लिया) को पुनः सुरक्षात्मक अवस्था में लौटाने में सक्षम पाया गया। पशु मॉडलों पर किए गए इस अध्ययन में अणु ने बीटा-एमिलॉइड प्लाक के आकार और विषाक्तता को घटाया, मस्तिष्क की सूजन कम की और स्मृति परीक्षणों में सुधार दर्ज किया। हालांकि यह अभी मानव परीक्षणों से दूर है, शोधकर्ता इसे प्रोटीन प्लाक को सीधे हटाने के बजाय माइक्रोग्लिया की कार्यक्षमता बहाल करने की दिशा में एक आशाजनक कदम मानते हैं।
आहार और संज्ञानात्मक गतिविधियों को लेकर भी नए आंकड़े सामने आए हैं। जामा न्यूरोलॉजी में प्रकाशित एक अवलोकनात्मक अध्ययन, जिसमें 10,775 प्रतिभागियों का दस वर्षों तक अनुसरण किया गया, ने पाया कि जो लोग अपनी दैनिक कैलोरी का 28 प्रतिशत या अधिक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से लेते हैं, उनमें डिमेंशिया का जोखिम अधिक होता है। वहीं, एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत प्रारंभिक निष्कर्षों के अनुसार, एक से अधिक भाषाएं बोलने वालों का मस्तिष्क आयु की तुलना में छह वर्ष तक युवा पाया गया, और चार भाषाएं बोलने पर यह अंतर 13 वर्ष तक पहुंच गया। हालांकि, बाद के विश्लेषणों ने संकेत दिया कि बहुभाषिकता डिमेंशिया के जोखिम को कम नहीं करती, बल्कि निदान को दो से पांच वर्ष विलंबित कर देती है—संभवतः यह संज्ञानात्मक आरक्षितता का परिणाम है जो लक्षणों को छिपाए रखती है।
भारत और दक्षिण एशिया के लिए इन निष्कर्षों के विशेष मायने हैं। इंडोनेशिया जैसे बहुभाषी देशों के अनुभव बताते हैं कि केवल भाषा कौशल ही पर्याप्त नहीं; प्रवासी आबादी में डिमेंशिया का खतरा अधिक पाया गया है, जो सामाजिक अलगाव, अवसाद और सीमित स्वास्थ्य सेवा पहुंच की भूमिका को रेखांकित करता है। भारत में वृद्धजनों की बढ़ती संख्या, शहरी वायु प्रदूषण का उच्च स्तर, और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत डिमेंशिया के बोझ को बढ़ाने वाले कारक हैं। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी आवास और स्वच्छता की कमी—जैसा कि पूर्वी कालीमंतन के मेरापुन गांव में वृद्धजनों के लिए चलाए जा रहे नवीनीकरण कार्यक्रम से उजागर हुआ—स्वस्थ मस्तिष्क के लिए आवश्यक पर्यावरणीय आधार को कमजोर करती है।
अगला कदम प्रीक्लिनिकल अणु OLE के सुरक्षा और प्रभावकारिता परीक्षणों की दिशा में बढ़ना तथा डब्ल्यूएचओ दिशानिर्देशों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों में शामिल करना है। विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि नींद की गुणवत्ता—न कि केवल अवधि—पर ध्यान देना, नियमित शारीरिक गतिविधि, और मध्य आयु से ही रक्तचाप व शर्करा का नियंत्रण दीर्घकालिक मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए सबसे ठोस उपाय हैं।
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