
जब ढोल की थाप और खाली कुर्सियों के बीच अमेरिका ने मनाया 250वां जन्मदिन
छोटे शहरों की परेड से लेकर राष्ट्रीय मॉल पर विरल भीड़ और माउंट रशमोर की परछाइयों तक, अमेरिकी विरासत के अनेक चेहरे एक साथ उभरे।
मैरीलैंड के कंबरलैंड शहर में दूर से ढोल की थाप सुनाई दी। उद्घोषक ने जैसे ही परेड शुरू होने की घोषणा की, बच्चे सड़क किनारे उछलने लगे। सेना के वाहन, बैंड और मेयर की झांकी से उड़ती टॉफियों के बीच वह सब कुछ वैसा ही लग रहा था जैसा पहले हुआ करता था। मेन स्ट्रीट की प्रबंधक मेलिंडा केलेहर ने बताया कि इस विभाजनकारी दौर में पूरे समुदाय को जोड़ने वाला आयोजन करना चुनौती थी, लेकिन शहर ने तीस नई दुकानों और साप्ताहिक सांस्कृतिक संध्याओं के साथ अपने केंद्र को फिर से जीवंत किया है। पास ही खड़े सत्तर वर्षीय अल फील्डस्टाइन ने याद किया कि 1889 में राष्ट्रपति बेंजामिन हैरिसन इसी रास्ते से गुज़रे थे और बचपन में उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के सैनिकों की परेड देखी थी।
जबकि कंबरलैंड जैसे छोटे शहरों ने स्थानीय गर्व से राष्ट्रीय पर्व मनाया, वाशिंगटन डी.सी. के नेशनल मॉल पर ‘ग्रेट अमेरिकन स्टेट फेयर’ का नज़ारा कुछ और ही कहानी कह रहा था। फोर्ब्स और द इंडिपेंडेंट की रिपोर्टों के अनुसार, उद्घाटन के दिन भीड़ अपेक्षाकृत विरल रही। बिजली कटौती के कारण फेरिस व्हील थम गया और कई राज्यों के मंडप बिना आधिकारिक प्रतिनिधियों के खाली पड़े रहे। एक चित्र में संगीतकार जेसन हर्शे को खाली कुर्सियों के सामने प्रस्तुति देते देखा गया। इस मेले में न तो पारंपरिक झूले थे और न ही कॉर्न डॉग; प्लाइवुड का ‘ट्रायम्फ आर्क’ और मेलानिया नामक गाय कौतूहल का केंद्र बने। राष्ट्रपति ट्रंप ने 45,000 की भीड़ का दावा किया, जबकि एनबीसी न्यूज़ के अनुसार संख्या मुश्किल से एक हज़ार थी और अधिकतर लोग ट्रंप समर्थक नारों वाले कपड़े पहने थे।
इस राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच, अनेक सांस्कृतिक संस्थानों ने इतिहास की गहरी परतों को टटोला। न्यूयॉर्क के यहूदी संग्रहालय में ‘सर्का 1776’ प्रदर्शनी में औपनिवेशिक यहूदी जीवन के चित्र और 1790 में जॉर्ज वॉशिंगटन और मोसेस सिक्सस के बीच हुए पत्राचार को रखा गया, जो धार्मिक स्वतंत्रता का आधार बना। वहीं, फिलाडेल्फिया के वाइट्ज़मैन संग्रहालय ने ‘द फर्स्ट सैल्यूट’ में उस सेफार्डिक व्यापारी समूह की कहानी रखी जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महाद्वीपीय सेना को हथियार मुहैया कराए। सड़कों पर एक और यात्रा जीवंत हुई—इतिहासकार एंथनी कोहेन मैरीलैंड से टोरंटो तक 750 मील की ‘स्वतंत्रता पदयात्रा’ पर निकले, जो कभी अंडरग्राउंड रेलरोड का हिस्सा थी। उनके साथ एक श्वेत साथी टॉम डेवुल्फ भी चले, जिनके पूर्वज कभी सबसे बड़े दास व्यापारी थे, यह कहते हुए कि “आप अपने परिवार की नई विरासत लिख सकते हैं।”
एनबीसी न्यूज़ के एक सर्वेक्षण ने बताया कि अमेरिकी अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में सबसे पहले गुलामी के उन्मूलन को देखते हैं, फिर द्वितीय विश्व युद्ध में विजय और चंद्रमा पर पहला कदम। लेकिन 77 प्रतिशत अमेरिकियों का मानना है कि संस्थापक मौजूदा स्थिति से निराश होते। यह बेचैनी माउंट रशमोर की चट्टानों पर भी छाया की तरह दिखी, जहाँ ट्रंप स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर भाषण देने वाले थे। फ्रैंकफर्टर ऑल्गेमाइने के अनुसार, वहाँ प्रवेश द्वार पर एक छोटा-सा जातीय वनस्पति उद्यान है, जिसे मूल अमेरिकी जनजातियों की याद में बनाया गया है—उन्हीं “बर्बर भारतीयों” का स्मारक जिनका ज़िक्र स्वतंत्रता की घोषणा में अपमानजनक शब्दों में किया गया था। रशमोर के पत्थरों पर चार राष्ट्रपतियों की भव्यता और उस चुप्पी के बीच, लोकतंत्र का यह तीर्थ अपनी ही बुनियादी मुश्किलों से रूबरू था।
एक तरफ कंबरलैंड का बुज़ुर्ग अल फील्डस्टाइन आसमान की ओर देखते हुए कह रहा था, “वे सब जा चुके हैं,” और दूसरी ओर नेशनल मॉल के खाली तंबू में मेलानिया नाम की गाय खड़ी थी। इन्हीं दृश्यों के बीच, अमेरिका का ढाई सौवां जन्मदिन अपने अतीत की गूँज और वर्तमान की खामोशियों को एक साथ समेटे हुए था।
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | +0.70 | aligned |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.30 | critical |
Small-town America reclaims its patriotic narrative, proving that community spirit can overcome national divisions.
The article personifies the local community as the true heart of America, contrasting it with elite bickering to make the celebration feel authentic and grounded.
The article omits the ongoing US military strikes in the Middle East and international criticism of American foreign policy, which would complicate the celebratory narrative.
The US 250th anniversary is overshadowed by renewed military strikes against Iran, highlighting American aggression abroad. Meanwhile, the World Cup hosted in the US showcases African teams' success, but the celebration is muted by geopolitical tensions.
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