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स्वास्थ्य और विज्ञानमंगलवार, 16 जून 2026

बिल्लियों और अंडों पर नई रिसर्च: सेहत को लेकर मिले-जुले नतीजे

स्वीडन, नीदरलैंड, अमेरिका और अर्जेंटीना से आए ताजा अध्ययन बताते हैं कि बिल्लियों से अस्थमा नहीं बढ़ता, लेकिन बाहरी बिल्लियाँ 100 रोगाणु फैला सकती हैं और तनाव में उन्हें सहलाना नुकसानदेह हो सकता है; वहीं अंडे जल्दी खिलाने से बच्चों में एलर्जी रुकती है।

हाल के वर्षों में पालतू जानवरों और मानव स्वास्थ्य को लेकर वैज्ञानिक समझ तेज़ी से बदली है। अमेरिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस बात की पुष्टि की है कि शिशुओं को चार से छह महीने की उम्र में ही अंडे खिलाना शुरू करने और नियमित रूप से देते रहने से अंडे से होने वाली खाद्य एलर्जी का ख़तरा काफ़ी हद तक कम हो जाता है। यह निष्कर्ष उसी सोच को आगे बढ़ाता है जो 2015 में मूंगफली एलर्जी पर हुए ऐतिहासिक अध्ययन से उभरी थी – कि एलर्जी पैदा करने वाले खाद्य पदार्थों से बचाने के बजाय उन्हें जल्दी आहार में शामिल करना अधिक सुरक्षात्मक होता है। अमेरिकी बाल रोग विशेषज्ञों की पुरानी सलाह के उलट, यह दृष्टिकोण अब वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता पा रहा है और भारत जैसे देशों में भी इसके सकारात्मक प्रभाव देखे जा सकते हैं, जहाँ खाद्य एलर्जी के मामले बढ़ रहे हैं।

दूसरी ओर, बिल्लियों को लेकर कई देशों से मिले-जुले संकेत आए हैं। स्वीडन में 30 हज़ार से अधिक प्रतिभागियों पर किए गए एक कोहोर्ट अध्ययन ने पाया कि जिन बच्चों के घर में बिल्ली होती है, उनमें अस्थमा की गंभीरता, दौरों की आवृत्ति और फेफड़ों की कार्यक्षमता उन बच्चों जैसी ही रहती है जिनके घर में बिल्ली नहीं है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसकी एक वजह यह है कि बिल्ली के एलर्जी कारक तत्व घर के बाहर भी व्यापक रूप से मौजूद होते हैं, इसलिए केवल पालतू बिल्ली से दूरी बनाना पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता। वहीं नीदरलैंड की ओपन यूनिवर्सिटी के एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन ने भावनात्मक सहारे की आम धारणा पर सवाल खड़े किए हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि तनाव के क्षणों में बिल्ली को सहलाना नकारात्मक भावनाओं को कम करने के बजाय उन्हें और तीव्र कर सकता है। प्रतिभागियों को पाँच दिनों तक दिन में दस बार सूचनाएँ भेजकर उनकी भावनात्मक स्थिति और पालतू जानवरों के साथ संपर्क का आकलन किया गया, जिससे यह अप्रत्याशित परिणाम सामने आया।

बिल्लियों से जुड़ा एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम भी उजागर हुआ है। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं ने पाया कि बाहरी वातावरण में स्वतंत्र रूप से घूमने वाली पालतू बिल्लियाँ, इनडोर बिल्लियों की तुलना में तीन से पाँच गुना अधिक ज़ूनोटिक रोगाणु ले जाती हैं, जो मनुष्यों में संक्रमण फैला सकते हैं। इनमें रेबीज़ और साल्मोनेला जैसे लगभग सौ विभिन्न रोगाणु शामिल हैं। ख़तरा इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बड़ी संख्या में पालतू बिल्लियाँ बिना निगरानी के बाहर जाती हैं, वन्यजीवों के संपर्क में आती हैं और सार्वजनिक स्थानों पर मल त्याग कर संदूषण फैलाती हैं। शिकार की प्रवृत्ति चूहों और चमगादड़ों जैसे जीवों से रोगाणुओं को सीधे घरों तक पहुँचाने का मार्ग बनाती है। विशेषज्ञों का सबसे प्रभावी हस्तक्षेप स्पष्ट है: बिल्लियों को घर के अंदर ही रखा जाए।

इन चिंताओं के बीच, अर्जेंटीना की योग विशेषज्ञ क्रिस्टीना गिनेर एक सकारात्मक पहलू लेकर आई हैं। उनका सुझाव है कि हर सुबह बिल्लियों और कुत्तों की तरह अंगड़ाई लेने और शरीर को खींचने की मुद्रा अपनाने से दिन की शुरुआत बेहतर होती है। यह प्राकृतिक क्रिया शरीर और मस्तिष्क को नींद से जागने के बीच एक कोमल संक्रमण देती है, जोड़ों को सक्रिय करती है और मानसिक सजगता बढ़ाती है। यह सलाह इस बात का प्रतीक है कि पालतू जानवरों से सीखे जा सकने वाले सबक हमारी सेहत के लिए लाभदायक हो सकते हैं, भले ही उनके साथ सीधा संपर्क हर स्थिति में फ़ायदेमंद न हो।

कुल मिलाकर ये अध्ययन मानव-पशु संबंधों की जटिलता को रेखांकित करते हैं। जहाँ एक ओर अंडे और मूंगफली जैसे एलर्जी कारकों का आरंभिक संपर्क प्रतिरक्षा प्रणाली को सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित करता है, वहीं बाहरी बिल्लियों के रोगाणु गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। भावनात्मक सेहत के लिए पालतू जानवरों की भूमिका भी सीधी-सादी नहीं है – संदर्भ और व्यक्ति की मनोदशा मायने रखती है। दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों में, जहाँ सड़कों पर बिल्लियों की बड़ी आबादी है और खाद्य एलर्जी के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, इन निष्कर्षों का विशेष महत्व है। आने वाले समय में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को पालतू जानवरों के प्रबंधन, आहार संबंधी सिफ़ारिशों और मानसिक स्वास्थ्य सहायता के बीच संतुलन बनाना होगा, ताकि विज्ञान की यह नई समझ आम जीवन में सुरक्षित और व्यावहारिक रूप से उतर सके।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 4 भाषाएँ

62%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa latinoamericanaStampa europea continentale
Stampa latinoamericana/ mercato
scetticismopragmatismo

A Swedish cohort study challenges the belief that living with cats worsens childhood asthma, finding no significant difference in symptoms or lung function. Meanwhile, practical warnings remind pet owners that even indoor animals can bring fleas and ticks into the home, and a yoga expert suggests imitating the morning stretch of cats and dogs for a healthier start to the day.

Stampa europea continentale/ nordica
scetticismoallarme

A Dutch study suggests that petting a cat when stressed may not bring the expected calm, and could even intensify negative emotions. The findings question the popular image of pets as natural stress relievers, urging a more cautious view of their emotional impact.

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बिल्लियों और अंडों पर नई रिसर्च: सेहत को लेकर मिले-जुले नतीजे

स्वीडन, नीदरलैंड, अमेरिका और अर्जेंटीना से आए ताजा अध्ययन बताते हैं कि बिल्लियों से अस्थमा नहीं बढ़ता, लेकिन बाहरी बिल्लियाँ 100 रोगाणु फैला सकती हैं और तनाव में उन्हें सहलाना नुकसानदेह हो सकता है; वहीं अंडे जल्दी खिलाने से बच्चों में एलर्जी रुकती है।

हाल के वर्षों में पालतू जानवरों और मानव स्वास्थ्य को लेकर वैज्ञानिक समझ तेज़ी से बदली है। अमेरिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस बात की पुष्टि की है कि शिशुओं को चार से छह महीने की उम्र में ही अंडे खिलाना शुरू करने और नियमित रूप से देते रहने से अंडे से होने वाली खाद्य एलर्जी का ख़तरा काफ़ी हद तक कम हो जाता है। यह निष्कर्ष उसी सोच को आगे बढ़ाता है जो 2015 में मूंगफली एलर्जी पर हुए ऐतिहासिक अध्ययन से उभरी थी – कि एलर्जी पैदा करने वाले खाद्य पदार्थों से बचाने के बजाय उन्हें जल्दी आहार में शामिल करना अधिक सुरक्षात्मक होता है। अमेरिकी बाल रोग विशेषज्ञों की पुरानी सलाह के उलट, यह दृष्टिकोण अब वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता पा रहा है और भारत जैसे देशों में भी इसके सकारात्मक प्रभाव देखे जा सकते हैं, जहाँ खाद्य एलर्जी के मामले बढ़ रहे हैं।

दूसरी ओर, बिल्लियों को लेकर कई देशों से मिले-जुले संकेत आए हैं। स्वीडन में 30 हज़ार से अधिक प्रतिभागियों पर किए गए एक कोहोर्ट अध्ययन ने पाया कि जिन बच्चों के घर में बिल्ली होती है, उनमें अस्थमा की गंभीरता, दौरों की आवृत्ति और फेफड़ों की कार्यक्षमता उन बच्चों जैसी ही रहती है जिनके घर में बिल्ली नहीं है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसकी एक वजह यह है कि बिल्ली के एलर्जी कारक तत्व घर के बाहर भी व्यापक रूप से मौजूद होते हैं, इसलिए केवल पालतू बिल्ली से दूरी बनाना पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता। वहीं नीदरलैंड की ओपन यूनिवर्सिटी के एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन ने भावनात्मक सहारे की आम धारणा पर सवाल खड़े किए हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि तनाव के क्षणों में बिल्ली को सहलाना नकारात्मक भावनाओं को कम करने के बजाय उन्हें और तीव्र कर सकता है। प्रतिभागियों को पाँच दिनों तक दिन में दस बार सूचनाएँ भेजकर उनकी भावनात्मक स्थिति और पालतू जानवरों के साथ संपर्क का आकलन किया गया, जिससे यह अप्रत्याशित परिणाम सामने आया।

बिल्लियों से जुड़ा एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम भी उजागर हुआ है। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं ने पाया कि बाहरी वातावरण में स्वतंत्र रूप से घूमने वाली पालतू बिल्लियाँ, इनडोर बिल्लियों की तुलना में तीन से पाँच गुना अधिक ज़ूनोटिक रोगाणु ले जाती हैं, जो मनुष्यों में संक्रमण फैला सकते हैं। इनमें रेबीज़ और साल्मोनेला जैसे लगभग सौ विभिन्न रोगाणु शामिल हैं। ख़तरा इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बड़ी संख्या में पालतू बिल्लियाँ बिना निगरानी के बाहर जाती हैं, वन्यजीवों के संपर्क में आती हैं और सार्वजनिक स्थानों पर मल त्याग कर संदूषण फैलाती हैं। शिकार की प्रवृत्ति चूहों और चमगादड़ों जैसे जीवों से रोगाणुओं को सीधे घरों तक पहुँचाने का मार्ग बनाती है। विशेषज्ञों का सबसे प्रभावी हस्तक्षेप स्पष्ट है: बिल्लियों को घर के अंदर ही रखा जाए।

इन चिंताओं के बीच, अर्जेंटीना की योग विशेषज्ञ क्रिस्टीना गिनेर एक सकारात्मक पहलू लेकर आई हैं। उनका सुझाव है कि हर सुबह बिल्लियों और कुत्तों की तरह अंगड़ाई लेने और शरीर को खींचने की मुद्रा अपनाने से दिन की शुरुआत बेहतर होती है। यह प्राकृतिक क्रिया शरीर और मस्तिष्क को नींद से जागने के बीच एक कोमल संक्रमण देती है, जोड़ों को सक्रिय करती है और मानसिक सजगता बढ़ाती है। यह सलाह इस बात का प्रतीक है कि पालतू जानवरों से सीखे जा सकने वाले सबक हमारी सेहत के लिए लाभदायक हो सकते हैं, भले ही उनके साथ सीधा संपर्क हर स्थिति में फ़ायदेमंद न हो।

कुल मिलाकर ये अध्ययन मानव-पशु संबंधों की जटिलता को रेखांकित करते हैं। जहाँ एक ओर अंडे और मूंगफली जैसे एलर्जी कारकों का आरंभिक संपर्क प्रतिरक्षा प्रणाली को सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित करता है, वहीं बाहरी बिल्लियों के रोगाणु गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। भावनात्मक सेहत के लिए पालतू जानवरों की भूमिका भी सीधी-सादी नहीं है – संदर्भ और व्यक्ति की मनोदशा मायने रखती है। दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों में, जहाँ सड़कों पर बिल्लियों की बड़ी आबादी है और खाद्य एलर्जी के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, इन निष्कर्षों का विशेष महत्व है। आने वाले समय में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को पालतू जानवरों के प्रबंधन, आहार संबंधी सिफ़ारिशों और मानसिक स्वास्थ्य सहायता के बीच संतुलन बनाना होगा, ताकि विज्ञान की यह नई समझ आम जीवन में सुरक्षित और व्यावहारिक रूप से उतर सके।

स्रोतों में मतभेद

स्वास्थ्य और विज्ञान · 5 स्रोत · 4 भाषाएँ

62%उच्च

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

समर्थक25%
न्यूनत्र50%
निंदक25%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 4 भाषाएँ

लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa latinoamericanaStampa europea continentale
Stampa latinoamericana/ mercato
scetticismopragmatismo

A Swedish cohort study challenges the belief that living with cats worsens childhood asthma, finding no significant difference in symptoms or lung function. Meanwhile, practical warnings remind pet owners that even indoor animals can bring fleas and ticks into the home, and a yoga expert suggests imitating the morning stretch of cats and dogs for a healthier start to the day.

Stampa europea continentale/ nordica
scetticismoallarme

A Dutch study suggests that petting a cat when stressed may not bring the expected calm, and could even intensify negative emotions. The findings question the popular image of pets as natural stress relievers, urging a more cautious view of their emotional impact.

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