
ट्रंप का बड़ा बयान: रूसी तेल पर प्रतिबंध जल्द होंगे बहाल, ईरान समझौते के बाद बदला रुख
जी7 शिखर सम्मेलन में ट्रंप ने कहा कि ओरमुज जलडमरूमध्य खुलने और तेल कीमतों में गिरावट के बाद अमेरिका रूसी कच्चे तेल पर अस्थायी छूट समाप्त कर सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के एवियां में चल रहे जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान एक बड़ी घोषणा करते हुए कहा कि वाशिंगटन जल्द ही रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंध फिर से लगा सकता है। उन्होंने इस कदम को ईरान के साथ हुए शांति समझौते और ओरमुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से जोड़ा, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति बहाल हुई है। ट्रंप ने साफ कहा, 'जल्द ही हम ऐसा करने की स्थिति में होंगे, क्योंकि अब तेल का प्रवाह शुरू हो चुका है।' यह बयान मार्च में दी गई अस्थायी छूट के बिल्कुल विपरीत है, जब अमेरिका ने रूसी तेल की समुद्री ढुलाई पर से प्रतिबंध हटा लिए थे।
मार्च की शुरुआत में जब अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की और ईरान ने जवाब में ओरमुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया, तो ब्रेंट क्रूड की कीमत कई वर्षों में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। तेल की किल्लत से बचने के लिए अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने 5 मार्च को एक 30-दिवसीय लाइसेंस जारी किया, जिसके तहत भारत को पहले से जहाजों पर लदी रूसी तेल की खरीद की अनुमति मिली। बाद में इस छूट का विस्तार सभी देशों के लिए कर दिया गया। ट्रंप ने अब स्पष्ट किया कि यह रियायत केवल इसलिए दी गई थी ताकि अमेरिका खुद अपने लिए 'कीमतों का झटका' पैदा न करे। अब जबकि ओरमुज से तेल की आपूर्ति फिर शुरू हो गई है और 19 जून तक समुद्री गलियारा पूरी तरह खुलने की उम्मीद है, ऐसी किसी ढील की जरूरत नहीं रह गई है।
वैश्विक स्तर पर इस घटनाक्रम के कई आयाम हैं। यूरोपीय सहयोगी उस समय चिंतित थे जब अमेरिका ने रूसी तेल पर प्रतिबंधों में ढील दी थी, क्योंकि इससे यूक्रेन पर आक्रमण के लिए मास्को पर दबाव बनाने की रणनीति कमजोर पड़ती दिखी। जी7 नेता अब रूस के ऊर्जा क्षेत्र को निशाना बनाने वाले प्रतिबंधों को और कड़ा करने पर चर्चा कर रहे हैं। दूसरी ओर, तेल बाजार में राहत है—16 जून को ब्रेंट की कीमत गिरकर 80 डॉलर से नीचे आ गई, जो कई महीनों का निचला स्तर है। रूस के लिए यह संकेत साफ है: उसके तेल निर्यात पर फिर से पाबंदी लग सकती है, जिससे उसकी आय पर और दबाव बढ़ेगा।
भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह मोड़ काफी अहम है। भारत ने छूट अवधि के दौरान भारी छूट पर रूसी क्रूड का आयात बढ़ाया था, जिससे उसकी रिफाइनरियों को फायदा हुआ और आयात बिल नियंत्रित रहा। अगर अमेरिका दोबारा प्रतिबंध लगाता है, तो भारतीय खरीदारों को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी होगी, संभवतः पश्चिम एशियाई या अफ्रीकी ग्रेड की ओर रुख करना पड़ेगा, जो महंगे हो सकते हैं। इससे न केवल भारत का चालू खाता घाटा प्रभावित होगा, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी दीर्घकालिक रणनीति पर भी सवाल खड़े होंगे। हालांकि, भारत ने पहले भी भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच तेल आपूर्ति में विविधता लाने की क्षमता दिखाई है।
आगे की राह अनिश्चित है। ट्रंप के बयान ने नीतिगत इरादा तो जाहिर कर दिया है, लेकिन वास्तविक समयसीमा ईरान समझौते के पूर्ण क्रियान्वयन और मध्य पूर्व में स्थायित्व पर निर्भर करेगी। यदि प्रतिबंध बहाल होते हैं, तो वैश्विक आपूर्ति शृंखला में एक बार फिर तनाव आ सकता है, हालांकि ओरमुज के खुले रहने से कुछ राहत बनी रहेगी। रूस को अपने तेल के लिए नए बाजार और भुगतान तंत्र खोजने की मजबूरी होगी। भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देशों के लिए यह समय कूटनीतिक संतुलन और आपूर्ति के वैकल्पिक मार्ग तलाशने का होगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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फ्रांस में जी7 शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अमेरिका जल्द ही रूसी तेल पर प्रतिबंध फिर से लगा सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य के अवरुद्ध होने के कारण अस्थायी छूट दी गई थी; अब ईरान समझौते के बाद कच्चे तेल का प्रवाह बहाल हो गया है, वाशिंगटन को राहत बनाए रखने का कोई कारण नहीं दिखता। यह बयान यूक्रेन को लेकर मास्को पर दबाव बढ़ाने के सहयोगियों के प्रयासों के अनुरूप है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने के बाद अमेरिका जल्द ही रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंध फिर से लगाने में सक्षम होगा। ईरान समझौते के बाद तेल प्रवाह की बहाली पिछली प्रतिबंध छूट के औचित्य को समाप्त कर देती है। यह टिप्पणी जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान आई, जहां नेता रूस पर आर्थिक शिकंजा कसने के तरीकों पर चर्चा कर रहे हैं।
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