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मंगलवार, 16 जून 2026

युद्धविराम के बाद भी गाजा में मौत का सिलसिला जारी, मलबे में दबी लाशें और बढ़ता इजरायली नियंत्रण

अक्टूबर 2025 की संघर्ष विराम घोषणा के बावजूद इजरायली हमलों में लगभग एक हजार फलस्तीनी मारे गए, जबकि मलबे में दबे शवों की पहचान का संकट गहराता जा रहा है।

गाजा पट्टी में पिछले साल अक्टूबर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता से घोषित युद्धविराम हिंसा पर लगाम लगाने में नाकाम साबित हुआ है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क के अनुसार, उस समझौते के बाद से अब तक इजरायली बलों की कार्रवाई में लगभग एक हजार फलस्तीनी मारे जा चुके हैं, जिनमें अधिकांश आम नागरिक हैं। ताजा हमलों में मध्य गाजा के नुसीरात शिविर के पास एक आवासीय इमारत पर हुई इजरायली स्ट्राइक में दो भाई—अहमद और महमूद अबू हीन—की मौत हो गई, जबकि उत्तरी इलाकों में इजरायली सेना ने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है, जिससे स्थानीय निवासी बेघर हो रहे हैं।

इस बीच, मलबे में दबे शवों का संकट एक अलग मानवीय त्रासदी बनकर उभरा है। भारी मशीनरी और सुरक्षित पहुंच के अभाव में राहत कार्य बेहद धीमा है, जिससे हजारों लापता फलस्तीनियों के शवों की पहचान का अवसर लगातार सिकुड़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय बीतने के साथ सड़न और रिकॉर्ड्स की कमी के कारण फोरेंसिक पहचान लगभग असंभव हो जाएगी, जिससे परिवारों को अपने प्रियजनों के भाग्य का पता लगाने का मौलिक अधिकार छिन जाएगा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा मंडराएगा।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 62वें सत्र में वोल्कर तुर्क ने चेतावनी दी कि इजरायली अधिकारी फलस्तीनियों को लगातार संकरी होती जगहों में धकेल रहे हैं और मानवीय सहायता पहुंचाने पर रोक लगा रहे हैं। उन्होंने पश्चिमी तट की स्थिति पर भी गहरी चिंता जताई, जहां इसी अवधि में 57 लोग मारे गए, लगभग 1,300 घायल हुए और सैकड़ों को हिरासत में लिया गया। इजरायली सेना और बाशिंदों ने भूमि अधिग्रहण के 23 आदेश जारी कर कब्जे की प्रक्रिया को और तेज कर दिया है, जिससे वहां के समुदायों का विस्थापन और विनाश बढ़ रहा है।

इजरायली पक्ष का कहना है कि उसके चार सैनिक हमास के लड़ाकों द्वारा मारे गए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकाय नागरिकों पर पड़ रहे असंगत प्रभाव को युद्धविराम की भावना का उल्लंघन मान रहे हैं। अमेरिकी मध्यस्थता वाला यह समझौता न तो हमास के निरस्त्रीकरण को सुनिश्चित कर सका और न ही इजरायली हमलों को रोक पाया। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा गतिरोध केवल सैन्य समाधान की सीमाओं को उजागर करता है और एक ऐसे राजनीतिक ढांचे की सख्त जरूरत को रेखांकित करता है जो दोनों पक्षों की सुरक्षा चिंताओं के साथ फलस्तीनी आत्मनिर्णय को संबोधित करे।

भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह संकट ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े सवाल खड़े करता है। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय कामगार मौजूद हैं और पश्चिम एशिया में अस्थिरता का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब केवल बयानों से आगे बढ़कर फोरेंसिक विशेषज्ञता, भारी उपकरण और मानवीय गलियारे उपलब्ध कराने होंगे, ताकि मलबे में दबी लाशों की पहचान हो सके और युद्धविराम को वास्तविक शांति में बदला जा सके।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

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गाज़ा में युद्धविराम टूट रहा है: हज़ारों शव मलबे में दबे हैं और उनकी पहचान न हो पाने का ख़तरा है। संयुक्त राष्ट्र ने इज़राइल पर युद्धविराम शुरू होने के बाद से लगभग एक हज़ार नागरिकों की हत्या का आरोप लगाया है, जबकि सहायता रोकी जा रही है और रहने की जगह सिकुड़ती जा रही है। मानवीय त्रासदी लगातार जारी है।

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हमास हमले के बाद बसने वालों को बड़े पैमाने पर हथियार बांटने से एक ऐसा राक्षस पैदा हो गया है जिसे राज्य अब नियंत्रित नहीं कर सकता। 140 से अधिक नई चौकियाँ स्थापित हो गई हैं और बसने वालों की हिंसा बेकाबू है, जो किसी भी वास्तविक युद्धविराम की संभावना को कमजोर कर रही है। यह संघर्ष विराम खोखला है क्योंकि सरकार ने वेस्ट बैंक पर अपनी पकड़ खो दी है।

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युद्धविराम के बाद भी गाजा में मौत का सिलसिला जारी, मलबे में दबी लाशें और बढ़ता इजरायली नियंत्रण

अक्टूबर 2025 की संघर्ष विराम घोषणा के बावजूद इजरायली हमलों में लगभग एक हजार फलस्तीनी मारे गए, जबकि मलबे में दबे शवों की पहचान का संकट गहराता जा रहा है।

गाजा पट्टी में पिछले साल अक्टूबर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता से घोषित युद्धविराम हिंसा पर लगाम लगाने में नाकाम साबित हुआ है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क के अनुसार, उस समझौते के बाद से अब तक इजरायली बलों की कार्रवाई में लगभग एक हजार फलस्तीनी मारे जा चुके हैं, जिनमें अधिकांश आम नागरिक हैं। ताजा हमलों में मध्य गाजा के नुसीरात शिविर के पास एक आवासीय इमारत पर हुई इजरायली स्ट्राइक में दो भाई—अहमद और महमूद अबू हीन—की मौत हो गई, जबकि उत्तरी इलाकों में इजरायली सेना ने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है, जिससे स्थानीय निवासी बेघर हो रहे हैं।

इस बीच, मलबे में दबे शवों का संकट एक अलग मानवीय त्रासदी बनकर उभरा है। भारी मशीनरी और सुरक्षित पहुंच के अभाव में राहत कार्य बेहद धीमा है, जिससे हजारों लापता फलस्तीनियों के शवों की पहचान का अवसर लगातार सिकुड़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय बीतने के साथ सड़न और रिकॉर्ड्स की कमी के कारण फोरेंसिक पहचान लगभग असंभव हो जाएगी, जिससे परिवारों को अपने प्रियजनों के भाग्य का पता लगाने का मौलिक अधिकार छिन जाएगा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा मंडराएगा।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 62वें सत्र में वोल्कर तुर्क ने चेतावनी दी कि इजरायली अधिकारी फलस्तीनियों को लगातार संकरी होती जगहों में धकेल रहे हैं और मानवीय सहायता पहुंचाने पर रोक लगा रहे हैं। उन्होंने पश्चिमी तट की स्थिति पर भी गहरी चिंता जताई, जहां इसी अवधि में 57 लोग मारे गए, लगभग 1,300 घायल हुए और सैकड़ों को हिरासत में लिया गया। इजरायली सेना और बाशिंदों ने भूमि अधिग्रहण के 23 आदेश जारी कर कब्जे की प्रक्रिया को और तेज कर दिया है, जिससे वहां के समुदायों का विस्थापन और विनाश बढ़ रहा है।

इजरायली पक्ष का कहना है कि उसके चार सैनिक हमास के लड़ाकों द्वारा मारे गए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकाय नागरिकों पर पड़ रहे असंगत प्रभाव को युद्धविराम की भावना का उल्लंघन मान रहे हैं। अमेरिकी मध्यस्थता वाला यह समझौता न तो हमास के निरस्त्रीकरण को सुनिश्चित कर सका और न ही इजरायली हमलों को रोक पाया। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा गतिरोध केवल सैन्य समाधान की सीमाओं को उजागर करता है और एक ऐसे राजनीतिक ढांचे की सख्त जरूरत को रेखांकित करता है जो दोनों पक्षों की सुरक्षा चिंताओं के साथ फलस्तीनी आत्मनिर्णय को संबोधित करे।

भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह संकट ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े सवाल खड़े करता है। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय कामगार मौजूद हैं और पश्चिम एशिया में अस्थिरता का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब केवल बयानों से आगे बढ़कर फोरेंसिक विशेषज्ञता, भारी उपकरण और मानवीय गलियारे उपलब्ध कराने होंगे, ताकि मलबे में दबी लाशों की पहचान हो सके और युद्धविराम को वास्तविक शांति में बदला जा सके।

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हमास हमले के बाद बसने वालों को बड़े पैमाने पर हथियार बांटने से एक ऐसा राक्षस पैदा हो गया है जिसे राज्य अब नियंत्रित नहीं कर सकता। 140 से अधिक नई चौकियाँ स्थापित हो गई हैं और बसने वालों की हिंसा बेकाबू है, जो किसी भी वास्तविक युद्धविराम की संभावना को कमजोर कर रही है। यह संघर्ष विराम खोखला है क्योंकि सरकार ने वेस्ट बैंक पर अपनी पकड़ खो दी है।

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