
नवजात मृत्यु, यातायात दुर्घटनाएँ और सरकारी नौकरी की चाह: वैश्विक स्वास्थ्य और सामाजिक प्राथमिकताएँ
नाइजीरिया से ईरान तक स्वास्थ्य संकट और भारत में सरकारी नौकरी की चाहत, सार्वजनिक सेवाओं की कमज़ोरी और युवा आकांक्षाओं के बीच गहरा अंतर्विरोध दिखाते हैं।
नाइजीरिया के एक शिशु स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने चेतावनी दी है कि देश में हर साल 2,80,000 नवजात जीवन के पहले 28 दिनों में ही दम तोड़ देते हैं, और ये मौतें अधिकतर रोकी जा सकने वाली या कुशल देखभाल से उपचार योग्य होती हैं। यह आँकड़ा नाइजीरिया को वैश्विक स्तर पर नवजात मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र बनाता है। इसी कड़ी में बांग्लादेश की राजधानी ढाका के आद-दीन अस्पताल में छह नवजातों की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था की चूक को उजागर किया। स्वास्थ्य मंत्री ने माना कि अस्पताल में न तो पर्याप्त वेंटिलेशन था और न ही शिशुओं को श्वास संकट के समय कोई चिकित्सक मौजूद रहा; सरकार ने दोषियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है। ये घटनाएँ अफ़्रीका और दक्षिण एशिया में स्वास्थ्य सेवाओं की उस कमज़ोर कड़ी को रेखांकित करती हैं जहाँ बुनियादी संसाधनों और जवाबदेही का अभाव सीधे जीवन लील लेता है।
भारत में संस्थागत प्रसव का आँकड़ा 95.4 प्रतिशत तक पहुँच गया है, लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के निष्कर्ष बताते हैं कि यह उपलब्धि समान नहीं है। 71.7 प्रतिशत प्रसव सरकारी अस्पतालों में होते हैं, जबकि 23.7 प्रतिशत निजी क्षेत्र पर निर्भर हैं; ग्रामीण इलाकों में सरकारी संस्थानों पर निर्भरता 76.6 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इसके साथ ही 20.1 प्रतिशत महिलाएँ 18 वर्ष से पहले विवाहित हो जाती हैं, जिससे प्रजनन स्वायत्तता और गर्भनिरोधक का बोझ लगातार महिलाओं पर ही रहता है। दूसरी ओर ईरान में आपातकालीन चिकित्सा सेवाएँ एम्बुलेंस की भारी कमी से जूझ रही हैं; संगठन प्रमुख ने बताया कि नगरपालिका कर्मचारियों को आपात प्रशिक्षण देकर और स्वास्थ्य केंद्रों में आपात बेस स्थापित कर लागत घटाने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं ईरान के स्वास्थ्य मंत्री ने एक विरोधाभास उजागर किया: बाँझपन उपचार केंद्रों से सालाना 8,000 जन्म होते हैं, लेकिन सड़क दुर्घटनाएँ हर साल 20,000 लोगों की जान ले लेती हैं।
इन स्वास्थ्य चुनौतियों के बीच भारत में युवाओं की एक अलग ही आकांक्षा सुर्खियों में है—सरकारी नौकरी। लाखों अभ्यर्थी हर साल संघ लोक सेवा आयोग जैसी परीक्षाओं में शामिल होते हैं, जहाँ सफलता दर एक प्रतिशत से भी कम है। परिवार वर्षों का समय और धन इस उम्मीद में लगाते हैं कि स्थायी सरकारी पद मिल जाएगा। यह रुझान एक गहरे अंतर्विरोध को सामने लाता है: जिन सार्वजनिक सेवाओं—स्वास्थ्य, आपातकालीन देखभाल, परिवार कल्याण—की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं, उन्हीं संस्थानों में नौकरी पाना सबसे बड़ा सपना बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नवजात मृत्यु दर कम करने के लिए कुशल प्रसव देखभाल, बेहतर आपात ढाँचा और किशोरियों को शिक्षा व प्रजनन अधिकार देकर विवाह की उम्र बढ़ाना ज़रूरी है। ईरान का अनुभव बताता है कि यदि यातायात सुरक्षा और आपात सेवाओं में निवेश किया जाए तो बाँझपन उपचार जैसी उन्नत चिकित्सा के साथ-साथ रोकी जा सकने वाली मौतों पर भी लगाम लग सकती है। भारत में सरकारी नौकरी की चाहत को यदि स्वास्थ्य क्षेत्र में रोज़गार के विस्तार से जोड़ा जाए तो यही आकांक्षा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ बन सकती है। नाइजीरिया से लेकर बांग्लादेश और ईरान तक फैली यह तस्वीर साफ़ करती है कि स्वास्थ्य संकट केवल चिकित्सा का नहीं, बल्कि सामाजिक प्राथमिकताओं और संस्थागत जवाबदेही का भी प्रश्न है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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नाइजीरिया में हर साल 2,80,000 नवजात शिशुओं की मृत्यु हो जाती है, जो इसे वैश्विक नवजात मृत्यु दर में सबसे खराब योगदानकर्ताओं में से एक बनाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से अधिकांश मौतें कुशल देखभाल से रोकी जा सकती हैं। इस स्थायी सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए एक नया अनुसंधान केंद्र स्थापित किया गया है।
संस्थागत प्रसव की उच्च दरों के बावजूद, भारत में मातृ एवं नवजात देखभाल गहराई से असमान बनी हुई है। एक अस्पताल को छह नवजात शिशुओं की कथित लापरवाही से मौत के बाद कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है, और स्वास्थ्य मंत्री ने शून्य सहनशीलता की कसम खाई है। विश्लेषक प्रणालीगत खामियों की ओर इशारा करते हैं जो सार्वजनिक स्वास्थ्य को कमजोर करती हैं, भले ही आधिकारिक आंकड़े प्रगति दिखाते हैं।
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