
जी7 के इतर मोदी की कनाडा और अमेरिका से अहम बातचीत, व्यापार-सुरक्षा में नई पहल
प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस में जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान कनाडा के साथ सुरक्षा सूचना समझौते और मुक्त व्यापार वार्ता को गति दी, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से संक्षिप्त भेंट ने द्विपक्षीय संबंधों में नई ऊर्जा भरी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस के एवियां-ले-बैं में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के इतर कनाडा के नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ एक अहम द्विपक्षीय बैठक की, जिसमें दोनों नेताओं ने रिश्तों को नई ऊंचाई देने का संकल्प जताया। यह एक साल से भी कम समय में दोनों की चौथी मुलाकात थी, जो 2023 में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के आरोपों के बाद पैदा हुए गहरे कूटनीतिक तनाव के बाद रिश्तों की बहाली की दिशा में एक ठोस कदम मानी जा रही है। बैठक में कार्नी ने मोदी को इसी साल कनाडा की आधिकारिक यात्रा का न्योता दिया और दोनों पक्षों ने एक व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सीईपीए) पर बातचीत को 2026 तक पूरा करने की इच्छा जताई। सबसे उल्लेखनीय पहल एक सामान्य सुरक्षा सूचना समझौते (जीएसआईए) पर वार्ता शुरू करने की सहमति रही, जिसके तहत दोनों देश वर्गीकृत रक्षा और सुरक्षा सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकेंगे। कार्नी ने इसी सप्ताह फ्रांस के साथ भी ऐसा ही समझौता किया था।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह बैठक कनाडा के साथ व्यापार, ऊर्जा, नवाचार, शिक्षा और प्रतिभा गतिशीलता जैसे क्षेत्रों में सहयोग को संतुलित ढंग से आगे बढ़ाने की रणनीति दिखाती है। कार्नी के वक्तव्य में विदेशी हस्तक्षेप या अंतरराष्ट्रीय दमन का कोई जिक्र नहीं था, जो पूर्ववर्ती ट्रूडो सरकार के रुख से अलग एक व्यावहारिक मोड़ का संकेत है। वहीं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ मोदी ने द्विपक्षीय संबंधों की प्रगति की समीक्षा की और व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी तथा रक्षा में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की। ये वार्ताएं भारत की उस व्यापक कूटनीति का हिस्सा हैं जो पश्चिमी लोकतंत्रों के साथ आर्थिक एकीकरण को गहरा करते हुए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मोदी की संक्षिप्त लेकिन गर्मजोशी भरी मुलाकात ने भी सुर्खियां बटोरीं। 16 महीने बाद पहली आमने-सामने की इस भेंट में ट्रंप ने मोदी से हाथ मिलाया और कंधे पर हाथ रखा, और दोनों सत्र के दौरान साथ-साथ बैठे। यह मुलाकात बुधवार को होने वाली औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता की भूमिका बन गई, जिसमें व्यापार, रक्षा सहयोग और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा अपेक्षित है। फरवरी 2025 में वाशिंगटन यात्रा के दौरान शुरू की गई 'यूएस-इंडिया कॉम्पैक्ट' पहल और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने के लक्ष्य को अब ठोस कदमों में बदलने की चुनौती है।
भारत की लगातार आठवीं जी7 भागीदारी वैश्विक मंच पर उसकी बढ़ती स्वीकार्यता को रेखांकित करती है। शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी को स्लोवाकिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भी मिला, जो शांति, सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर भारत की भूमिका की अंतरराष्ट्रीय पहचान है। दक्षिण एशिया के लिए इस कूटनीति के मायने गहरे हैं: कनाडा के साथ सुरक्षा सूचना समझौता और व्यापार विस्तार प्रवासी भारतीयों, विशेषकर पंजाबी समुदाय, को प्रभावित करने वाले खालिस्तानी सक्रियता के मुद्दे को अप्रत्यक्ष रूप से प्रबंधित करने का एक औजार बन सकता है।
आगे की राह में भारत के सामने अवसर और जोखिम दोनों हैं। कनाडा के साथ सीईपीए को 2026 की समय-सीमा में पूरा करना और अमेरिका के साथ व्यापार लक्ष्यों को साधना, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच आपूर्ति श्रृंखलाओं के विविधीकरण की मजबूरी से प्रेरित है। मोदी-कार्नी की बढ़ती रसायन शास्त्र और ट्रंप के साथ सहज संवाद भारत की सक्रिय कूटनीति को दर्शाते हैं, लेकिन असली परीक्षा इन वादों को ठोस नीतिगत परिणामों में बदलने की होगी।
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कार्नी और मोदी के बीच बैठक में वर्गीकृत सूचना साझा करने के समझौते पर बातचीत शुरू करने पर ध्यान केंद्रित किया गया, जबकि कनाडा में भारतीय हस्तक्षेप के पिछले आरोपों का कोई उल्लेख नहीं किया गया। यह सतर्क संबंध सुधार का संकेत है, जो अनसुलझे तनावों के बजाय सुरक्षा सहयोग को प्राथमिकता देता है।
एक साल से भी कम समय में मोदी और कार्नी की चौथी मुलाकात निर्णायक संबंध सुधार का संकेत है, जिसमें दोनों पक्ष 2026 तक व्यापक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने पर जोर दे रहे हैं। इस कथा में भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा, ऊर्जा सहयोग और निज्जर आरोपों जैसी पुरानी परेशानियों को दरकिनार करने पर प्रकाश डाला गया है।
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