
अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद सोने की कीमतों में जोरदार उछाल
युद्ध समाप्ति और होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने की घोषणा से कच्चे तेल में गिरावट और डॉलर की कमजोरी ने वैश्विक सोने के भाव को ढाई प्रतिशत तक चढ़ा दिया।
सोमवार को वैश्विक बाजारों में सोने की कीमतें 2% से 2.5% तक उछल गईं, जो 9 जून के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। हाजिर सोना 4,320 डॉलर प्रति औंस के पार चला गया और अगस्त डिलीवरी के लिए अमेरिकी वायदा 4,340 डॉलर तक पहुंचे। यह तेजी अमेरिका और ईरान के बीच रविवार को एक प्रारंभिक शांति ढांचे पर सहमति बनने के बाद आई, जिसके तहत फरवरी से चल रहे सैन्य संघर्ष को समाप्त करने, ईरान पर से अमेरिकी नाकेबंदी हटाने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का रास्ता साफ हुआ। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया पर घोषणा की कि इस समझौते पर शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर होंगे।\n\nफरवरी के अंत में अमेरिकी-इजरायली हमले के साथ शुरू हुए इस संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया था, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। इस महंगाई के दबाव ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें बढ़ाने के लिए मजबूर किया, जिससे सोने जैसी बिना ब्याज वाली परिसंपत्तियों का आकर्षण लगातार कम होता गया। पिछले कुछ महीनों में सोने की कीमत अपने उच्च स्तरों से करीब 20% तक नीचे आ चुकी थी। शांति समझौते की खबर ने इस स्थिति को अचानक पलट दिया।\n\nविभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के बाजारों की प्रतिक्रिया में स्पष्ट समानता दिखी। अरब मीडिया रिपोर्टों में कीमतों के उछाल और मुद्रास्फीति की चिंता में कमी को रेखांकित किया गया, जबकि ईरानी स्रोतों ने इस अप्रत्याशित उछाल को “बाजारों के लिए सरप्राइज” बताया। पश्चिमी विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी डॉलर का दस दिन के निचले स्तर पर पहुंचना एक बड़ा कारण बना, जिससे अन्य मुद्राओं वाले निवेशकों के लिए सोना सस्ता हो गया। कच्चे तेल में 4% से अधिक की गिरावट ने मुद्रास्फीति की आशंकाओं को कम कर दिया, जिससे केंद्रीय बैंकों पर दरें कम करने या स्थिर रखने का दबाव बढ़ेगा—यह सोने की मांग के लिए सकारात्मक है।\n\nदक्षिण एशिया के लिए इस घटनाक्रम के मिश्रित संकेत हैं। पाकिस्तान ने मध्यस्थता की भूमिका निभाते हुए समझौते की घोषणा की, जिससे क्षेत्र में उसकी कूटनीतिक साख मजबूत हुई है, हालांकि भारत की ओर से अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा सोना आयातक है, के लिए डॉलर में आई तेजी रुपये में मूल्य को प्रभावित कर सकती है; हालाँकि डॉलर की कमजोरी से आयातित महंगाई का दबाव कुछ हद तक कम होगा। अगर शुक्रवार को हस्ताक्षर के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुलता है, तो तेल की कीमतों में स्थिरता आने से भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है, लेकिन सोने के ऊंचे दाम आगामी त्योहारी सीजन में मांग को प्रभावित कर सकते हैं।\n\nफिलहाल बाजार शुक्रवार के औपचारिक समझौते की बारीकियों पर नजरें जमाए हुए हैं। यदि समझौता अमल में आता है और तेल का प्रवाह सुचारू होता है, तो वैश्विक वित्तीय हालात में ढील आने से सोने को और सहारा मिल सकता है। हालांकि, भू-राजनीतिक स्थिरता से आमतौर पर सुरक्षित निवेश की मांग घटती है, लेकिन इस मामले में मुद्रास्फीति और डॉलर का मिलाजुला प्रभाव ज्यादा निर्णायक साबित हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि थोड़े समय में अस्थिरता बनी रह सकती है, क्योंकि बाजार इस ऐतिहासिक उलटफेर को पूरी तरह पचाने की कोशिश कर रहे हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरान और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक शांति समझौते ने बाज़ारों को चौंका दिया, सोना आसमान छूने लगा और तेल की कीमतें गिर गईं। यह समझौता युद्ध समाप्त करता है, क्रूर नाकेबंदी हटाता है और हॉर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलता है, यह साबित करता है कि अटूट प्रतिरोध न्यायपूर्ण शांति प्राप्त कर सकता है। तेहरान की जीत क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के एक नए अध्याय का संकेत है।
सोना 2% से अधिक उछला क्योंकि निवेशकों ने अमेरिका-ईरान के प्रारंभिक शांति समझौते का स्वागत किया, जिससे सैन्य तनाव कम हुआ और महत्वपूर्ण शिपिंग मार्ग सुरक्षित हुए। यह समझौता मुद्रास्फीति की आशंकाओं को शांत करता है और कच्चे तेल की लागत घटाता है, लेकिन खाड़ी देश सतर्क हैं और सवाल उठा रहे हैं कि क्या ईरान की प्रतिबद्धताएं टिकाऊ हैं। क्षेत्र स्थायी शांति की उम्मीद करता है, साथ ही तेहरान की कूटनीतिक उपलब्धियों पर सावधान नजर रखता है।
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