
रुपया-रॅन्मिन्बी सीधा लेन-देन: इंडोनेशिया ने चीन और हांगकांग के साथ ऐतिहासिक मुद्रा समझौता किया
बैंक इंडोनेशिया और पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के बीच द्विपक्षीय मुद्रा अदला-बदली व्यवस्था पर हस्ताक्षर से डॉलर पर निर्भरता घटाने और रुपए को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थापित करने की नई संभावनाएं खुली हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर के दबदबे को चुनौती देने वाला एक निर्णायक कदम 11 जून 2026 को शंघाई में उठा, जब बैंक इंडोनेशिया के गवर्नर पेरी वारजियो और पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के गवर्नर पान गोंगशेंग ने द्विपक्षीय मुद्रा अदला-बदली व्यवस्था (बीसीएसए) पर हस्ताक्षर किए। इसी मंच पर हांगकांग मौद्रिक प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी एडी यू के साथ स्थानीय मुद्रा लेन-देन (एलसीटी) पर एक समझौता ज्ञापन भी हुआ, जिससे इंडोनेशिया, मुख्यभूमि चीन और हांगकांग के बीच व्यापार अब सीधे रुपए और विदेशी रॅन्मिन्बी में निपटाया जा सकेगा। इंडोनेशियाई संसद के उपाध्यक्ष सूफमी दास्को अहमद ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इससे रुपया मजबूत होगा और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम होगी।
यह घटनाक्रम केवल दक्षिण-पूर्व एशिया तक सीमित नहीं है। लैटिन अमेरिका से भी मिलती-जुलती खबरें आ रही हैं: अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष सैंटियागो बौसिली ने इसी सप्ताह शंघाई में बातचीत कर 20 अरब डॉलर की मुद्रा अदला-बदली सुविधा को नवीनीकृत करने की दिशा में प्रगति की, साथ ही भुगतान प्रणालियों की अंतर-संचालनीयता पर भी चर्चा की। दोनों महाद्वीपों के ये प्रयास एक साझा रणनीति की ओर इशारा करते हैं: उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपने विदेशी व्यापार में पश्चिमी मुद्राओं की जगह स्थानीय विनिमय माध्यमों को प्राथमिकता दे रही हैं। चीन इस बदलाव का केंद्र बनता जा रहा है, जो रॅन्मिन्बी के अंतरराष्ट्रीयकरण के साथ-साथ भागीदार देशों की मुद्राओं को भी समर्थन दे रहा है।
इंडोनेशिया के भीतर ही रुपए को सहारा देने के लिए बैंक इंडोनेशिया ने एक और हथियार तैयार किया है: सेक्युरिटास रुपिया बैंक इंडोनेशिया (एसआरबीआई)। इस उपकरण ने ऊंची प्रतिफल दरों के कारण निवेशकों का भरोसा जीता है और हाल के दिनों में रुपए की मजबूती में योगदान दिया है। हालांकि, इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट ऑफ इकनॉमिक्स एंड फाइनेंस (इंडेफ) के विशेषज्ञ एंड्री सैट्रियो नुग्रोहो ने आगाह किया है कि एसआरबीआई में बढ़ता निवेश बैंकों की उत्पादक क्षेत्रों को ऋण देने की क्षमता को सीमित कर सकता है, जिससे वास्तविक अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ने का जोखिम है।
इन घटनाक्रमों का दक्षिण एशिया के लिए भी संकेत स्पष्ट है। भारत पहले ही रुपए में अंतरराष्ट्रीय व्यापार निपटान की पहल कर चुका है और संयुक्त अरब अमीरात, रूस जैसे देशों के साथ स्थानीय मुद्रा व्यवस्थाएं विकसित कर रहा है। इंडोनेशिया-चीन-हांगकांग मॉडल यह दर्शाता है कि क्षेत्रीय मुद्रा गलियारे अब द्विपक्षीय समझौतों से आगे बढ़कर बहुपक्षीय भुगतान ढांचे का रूप ले रहे हैं। आगे की राह में चुनौतियां भी हैं: मुद्रा स्थिरता बनाए रखना, पर्याप्त तरलता सुनिश्चित करना और घरेलू ऋण बाजार को संतुलित करना। फिर भी, शंघाई में हुए ये समझौते एक ऐसे भविष्य की नींव रखते हैं जहाँ व्यापार का नक्शा डॉलर के बजाय साझा समृद्धि की मुद्राओं में खिंचेगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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इंडोनेशिया ने चीन के साथ एक द्विपक्षीय मुद्रा स्वैप समझौता करके रुपिया को मजबूत करने और डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीतिक पहल की है। इस समझौते को राष्ट्रीय आर्थिक सहनशक्ति के लिए एक बड़ी सफलता और रुपिया के अंतर्राष्ट्रीयकरण की दिशा में कदम माना जा रहा है, जिससे हांगकांग में रुपिया और रॅन्मिन्बी में लेन-देन संभव हो गया है।
अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक प्रमुख ने चीन की यात्रा समाप्त की और 20 अरब डॉलर की स्वैप लाइन को नवीनीकृत करने की दिशा में प्रगति की, जिसे भंडार मजबूत करने का एक व्यावहारिक कदम बताया गया। बातचीत में भुगतान प्रणाली की अंतरसंचालनीयता पर तकनीकी चर्चा शामिल थी, जिसमें कोई स्पष्ट भू-राजनीतिक स्वर नहीं था।
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