
हम दो, हमारे 1.9: गिरती प्रजनन दर और बदलते सामाजिक सपने
भारत की प्रजनन दर 1.9 पर पहुँच गई है, यह आँकड़ा महिलाओं की शिक्षा, करियर और आत्मनिर्भरता के बढ़ते विकल्पों की कहानी कहता है।
कारपोरेट क्षेत्र में काम करने वाली 36 वर्षीय शेरोन माइकल के लिए वह पल किसी फ़िल्मी दृश्य जैसा नहीं था। न कोई बड़ी घटना, न एकाएक लिया गया फ़ैसला। बीते कई वर्षों के अनुभवों, एमबीए की पढ़ाई के लिए करियर ब्रेक और आत्मचिंतन की परतों के बीच एक दिन उन्होंने बस इतना समझ लिया कि माँ बनना उनकी ज़िंदगी के ख़ाके में फ़िट नहीं बैठता। "मुझे अब भी इस स्तर की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार महसूस नहीं होता," वह कहती हैं।
यह व्यक्तिगत कहानी अब राष्ट्रीय आँकड़ों में नज़र आती है। नमूना पंजीकरण प्रणाली की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर गिरकर 1.9 रह गई है, जो 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है। यह गिरावट दशकों चले परिवार-नियोजन अभियानों और 'हम दो, हमारे दो' जैसे नारों की बुनियाद पर खड़ी है, लेकिन अब इसके पीछे की वजहें बदल गई हैं। पहले जहाँ सरकारी दबाव और आर्थिक मजबूरी बच्चे कम करने की वजह थी, वहीं अब यह फ़ैसला स्वैच्छिक और निजी आकांक्षाओं से प्रेरित हो रहा है।
विशेषज्ञ इसे प्रगति का संकेत मानते हैं। एशिया-प्रशांत की मुख्य अर्थशास्त्री एलिसिया गार्सिया-हेरेरो के अनुसार, "भारत की प्रजनन दर में गिरावट विफलता नहीं, बल्कि विकास का प्रमाण है।" यह बदलाव एशिया और यूरोप के देशों में पहले ही देखा जा चुका है। स्विट्ज़रलैंड में ज्यूरिख विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के मुताबिक़, पिछले दस वर्षों में जान-बूझकर निःसंतान रहने का फ़ैसला लेने वाले 20-39 आयुवर्ग के लोगों का अनुपात 7 से दोगुना होकर 16 प्रतिशत हो गया है। फ़्रांस में भी मातृत्व को लेकर दुविधा पर किताबें और बहसें आम हो रही हैं।
इस जनसांख्यिकीय बदलाव के प्रभाव सिर्फ़ परिवार तक सीमित नहीं हैं। अर्जेंटीना में पिछले दस सालों में 3 से 5 साल के बच्चों की आबादी 31 प्रतिशत घट चुकी है, जिससे स्कूलों में जगह खाली हो रही है। रिपोर्टों के अनुसार, यदि मौजूदा बुनियादी ढाँचे का सही इस्तेमाल हो तो प्री-स्कूल शिक्षा की कवरेज 2027 तक 98 प्रतिशत तक पहुँच सकती है। इसी तरह, ब्राज़ील में उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन 25 प्रतिशत से अधिक वयस्कों ने अभी भी प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं की है। ये आँकड़े दिखाते हैं कि घटती आबादी अवसर ला सकती है, लेकिन असमानता की खाई भी गहरी कर सकती है।
भारत में इन सबके बीच, 2027 की जनगणना के लिए 33 लाख प्रगणक सड़कों पर उतर आए हैं। उनमें से कई सरकारी स्कूलों की शिक्षिकाएँ हैं, जो चिलचिलाती धूप में घर-घर जाकर परिवारों की गिनती कर रही हैं। जिस स्कूल में कभी बच्चों के शोर से गूँज होती थी, वहीं की शिक्षिका अब यह नोट कर रही है कि हर अगले दरवाज़े पर बच्चों की संख्या घटती जा रही है। यह तस्वीर सिर्फ़ आँकड़ों की नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की है जो अपनी सबसे निजी चाहतों को नए सिरे से तय कर रहा है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
2 संपादकीय समूह · 4 भाषाएँ
India's demographic narrative shifts from population explosion to below-replacement fertility, with the census now focused on counting a vast population and understanding the implications of declining birth rates. The tone is factual, emphasizing data collection and long-term planning. This blocs frames the issue as a logistical and national challenge rather than a personal one.
Young Indians are increasingly choosing to delay or forgo motherhood due to career aspirations and personal freedom, with individual stories highlighting the rational weighing of parenthood against autonomy. The narrative is sympathetic to these personal choices, framing them as a natural response to changing economic and social realities. The bloc focuses on emotional and qualitative aspects rather than macro statistics.
संबंधित लेख
ईरान ने युद्धविराम उल्लंघनों पर होर्मुज जलडमरूमध्य बंद किया, अमेरिका ने इनकार किया
8 भाषाएँ · 52 स्रोत
अपराध एवं आपदाम्यूनिख में मालगाड़ियों की टक्कर: पुल से गिरे डिब्बे, एक व्यक्ति की मौत
11 भाषाएँ · 20 स्रोत
न्याय और कानूनबेगोन्या गोमेज़ पर मुक़दमे का आदेश, पासपोर्ट ज़ब्त: स्पेन की राजनीति में हलचल
7 भाषाएँ · 23 स्रोत